India Arbitration Seats: निवेशक क्यों करते हैं विदेशी सीटों को पसंद? जानें वजह

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
India Arbitration Seats: निवेशक क्यों करते हैं विदेशी सीटों को पसंद? जानें वजह
Overview

भारत में लीगल फ्रेमवर्क में सुधारों के बावजूद, अदालतों में देरी फैसलों को लागू कराने में सबसे बड़ी रुकावट बनी हुई है। विदेशी निवेशक जोखिम कम करने के लिए अक्सर विदेशी सीटों को चुनते हैं, क्योंकि आर्बिट्रेशन अवार्ड्स (arbitration awards) का केवल 40% ही वसूल हो पाता है।

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एनफोर्समेंट (Enforcement) में कमी

भले ही भारत ने लोकल आर्बिट्रेशन संस्थाओं को विकसित करने और ज्यूडिशियरी (judiciary) को और बेहतर बनाने में प्रगति की हो, लेकिन डिस्प्यूट रिजॉल्यूशन (dispute resolution) के सुव्यवस्थित तरीके का वादा अदालती हकीकतों के सामने अक्सर अधूरा रह जाता है। अड़चन ट्रिब्यूनल (tribunal) के स्तर पर नहीं, बल्कि लिटिगेशन (litigation) के कठिन, सेट-असाइड (set-aside) और एनफोर्समेंट (enforcement) चरणों में बनी हुई है।

विदेशी सीटों की ओर कैपिटल फ्लाइट (Capital Flight)

अंतरराष्ट्रीय निवेशक, जो निश्चितता और तेजी को प्राथमिकता देते हैं, अब भारत की जगहों को आर्बिट्रेशन सीट चुनने से कतरा रहे हैं। यह ट्रेंड तब भी जारी है जब पड़ोसी देशों में भी ऐसी ही भौगोलिक या सांस्कृतिक निकटता है। न्यूट्रल (neutral) सीटों की यह रणनीतिक प्राथमिकता भारतीय न्यायिक प्रक्रिया की समयबद्धता पर एक मूलभूत अविश्वास से उपजी है। जब अंतरिम सुरक्षा या अंतिम एनफोर्समेंट ऑर्डर (enforcement order) में कोर्ट की लंबी देरी होती है, तो आर्बिट्रेशन अवार्ड (arbitration award) को हितधारकों द्वारा एक कागजी जीत के रूप में देखा जाता है, न कि एक निश्चित वित्तीय परिणाम के रूप में।

खराब ड्राफ्टिंग (Drafting) की छिपी हुई लागतें

कानूनी पेशेवर अनुबंध के शुरुआती चरण में ही कई एनफोर्समेंट (enforcement) विफलताओं की जड़ बताते हैं। सामान्य ड्राफ्टिंग (drafting) की चूकें, विशेष रूप से हियरिंग की भौतिक जगह और आर्बिट्रेशन की कानूनी सीट के बीच का अंतर, अक्सर ज्यूरिसडिक्शनल (jurisdictional) चुनौतियों को जन्म देती हैं। ये अस्पष्टताएं हारने वाले पक्षों को अलग से मुकदमा शुरू करने का मौका देती हैं, जिससे पारंपरिक कोर्ट की कार्यवाही पर आर्बिट्रेशन (arbitration) चुनने के फायदे खत्म हो जाते हैं। इन प्रोसीजरल डेफिनिशन (procedural definitions) को मानकीकृत करने के लिए लेजिस्लेटिव रिफॉर्म (legislative reform) को अक्सर आवश्यक उपाय बताया जाता है।

रिकवरी गैप (Recovery Gap): फॉरेंसिक (Forensic) नजरिया

रिस्क मैनेजमेंट (risk management) के नजरिए से, अवार्ड जीतने और पैसा वसूलने के बीच का अंतर बहुत बड़ा है। इंडस्ट्री के आंतरिक आंकड़ों से पता चलता है कि आर्बिट्रल अवार्ड्स (arbitral awards) के लिए रिकवरी रेट (recovery rate) केवल 35% से 45% तक है। यह निराशाजनक कन्वर्जन रेट (conversion rate) संस्थागत निवेशकों को मुकदमेबाजी प्रक्रिया को M&A लेनदेन की तरह ही गंभीरता से लेने पर मजबूर करता है। सफलता को अब मध्यस्थ के फैसले से नहीं, बल्कि विरोधी पक्ष के बचाव के उपाय शुरू करने से पहले संपत्तियों की पहचान करने और उन्हें सुरक्षित करने की क्षमता से मापा जाता है। अगर केस के साथ-साथ फॉरेंसिक 'रिकवरेबिलिटी असेसमेंट' (recoverability assessment) नहीं किया जाता है, तो आर्बिट्रेशन (arbitration) प्रक्रिया वैल्यू डिस्ट्रक्शन (value destruction) का एक अभ्यास बन सकती है, जिसमें उच्च कानूनी फीस और बहुत कम नेट रिटर्न (net return) मिलता है। क्रॉस-बॉर्डर मार्केट (cross-border markets) में काम करने वाली संस्थाओं के लिए, एनफोर्समेंट (enforcement) के संबंध में मेजबान देश की सार्वजनिक नीति को अनदेखा करना अब टिकाऊ रणनीति नहीं है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.