अमेरिकी कोर्ट ने गौतम अडानी को एक बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने उनसे पूछा है कि क्या रिश्वतखोरी के मामले को खारिज करने के संबंध में कोई गुप्त समझौता हुआ है? जज ने **15 जुलाई** तक हलफनामा मांगा है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि न्याय विभाग (Department of Justice) द्वारा केस वापस लेने के फैसले में किसी भी अनडिस्क्लोज्ड व्यवस्था का हाथ नहीं है।
कोर्ट की सख्त निगरानी!
अमेरिका के पूर्वी न्यूयॉर्क जिले की डिस्ट्रिक्ट कोर्ट, न्याय विभाग (DOJ) की गौतम अडानी और अन्य अधिकारियों के खिलाफ दायर रिश्वतखोरी की याचिका को खारिज करने की अर्जी पर फैसला लेने से पहले और स्पष्टता चाहती है। जज निकोलस गारौफिस ने 15 जुलाई तक एक हलफनामा (Affidavit) जमा करने का आदेश दिया है। इसमें विशेष रूप से उन वादों, प्रस्तावों या आदान-प्रदान के बारे में खुलासे मांगे गए हैं, जो सरकार द्वारा मामले को खारिज करने के कदम से जुड़े हो सकते हैं।
मामला क्यों हुआ दर्ज?
यह कदम DOJ द्वारा आपराधिक मामले को वापस लेने के एक असामान्य अनुरोध के बाद आया है, जो पिछली अमेरिकी प्रशासन के दौरान सामने आया था। DOJ का तर्क था कि यह मामला मुख्य रूप से विदेशी आचरण पर केंद्रित था और भारतीय अधिकारियों के लिए बेहतर है। लेकिन, जज गारौफिस ने फेडरल रूल ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर 48(a) के तहत अपने अधिकार का प्रयोग किया है। इस नियम के अनुसार, कोर्ट को यह मूल्यांकन करने की आवश्यकता होती है कि क्या सरकार के खारिज करने के कारणों का कोई ठोस आधार है और वे पारदर्शी हैं। जज विशेष रूप से यह सत्यापित करना चाहते हैं कि क्या पक्षों के बीच कोई अन-रिकॉर्डेड या अनडिस्क्लोज्ड समझौते हुए थे, जिन्होंने सरकार के रुख में अचानक बदलाव लाया हो।
आरोपों का सच क्या है?
मूल आरोप पत्र में गौतम अडानी, सागर अडानी, वीनीत जैन, रणजीत गुप्ता और अन्य सहयोगियों पर बड़े पैमाने पर रिश्वतखोरी की योजना का आरोप लगाया गया था। कोर्ट के दस्तावेजों के अनुसार, इस योजना में कथित तौर पर भारतीय राज्य बिजली वितरण कंपनियों के अधिकारियों को कुल लगभग ₹2,029 करोड़ की रिश्वत देने का वादा शामिल था। आरोपों में कहा गया था कि इस राशि में से लगभग ₹1,750 करोड़ आंध्र प्रदेश के अधिकारियों के लिए थे, ताकि 7 गीगावॉट सौर ऊर्जा क्षमता के समझौते हो सकें। DOJ ने हाल ही में इस मुकदमे को एक ऐसी रणनीति के रूप में वर्णित किया था जिसमें ट्रायल की कोई यथार्थवादी संभावना नहीं थी, जिसके कारण उन्होंने केस को खारिज करने की अर्जी दी थी।
निवेशकों पर क्या होगा असर?
निवेशकों के लिए, कोर्ट द्वारा औपचारिक हलफनामा मांगने से मामले में प्रक्रियात्मक जटिलता की एक परत जुड़ गई है। इस अनुरोध का परिणाम यह तय करेगा कि याचिका को आधिकारिक तौर पर खारिज किया जाता है या कोर्ट को आगे की कार्यवाही की आवश्यकता होती है। फोकस इस बात पर बना हुआ है कि क्या यह खारिज करने की प्रक्रिया अमेरिकी न्यायिक प्रणाली में मानक कानूनी पारदर्शिता की आवश्यकताओं का पालन करती है। कंपनी ने लगातार इन दावों के संबंध में किसी भी गलत काम से इनकार किया है। जैसे-जैसे 15 जुलाई की समय सीमा नजदीक आ रही है, बाजार यह देखेगा कि क्या हलफनामे का सबमिशन कोर्ट की आवश्यकताओं को पूरा करता है या आगे की न्यायिक जांच की ओर ले जाता है। इस कानूनी विवाद का अंतिम समाधान समूह के अंतरराष्ट्रीय व्यापार शासन और नियामक स्थिति पर नज़र रखने वालों के लिए एक महत्वपूर्ण निगरानी बिंदु बना हुआ है।
