ITAT का बड़ा फैसला: को-ऑप सोसाइटियों की बल्ले-बल्ले! लेट फाइलिंग पर भी मिली बैंक ब्याज पर टैक्स छूट

LAWCOURT
Whalesbook Logo
AuthorAditya Rao|Published at:
ITAT का बड़ा फैसला: को-ऑप सोसाइटियों की बल्ले-बल्ले! लेट फाइलिंग पर भी मिली बैंक ब्याज पर टैक्स छूट
Overview

इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) ने को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटियों को बड़ी राहत दी है। ट्रिब्यूनल ने फैसला सुनाया है कि ये सोसाइटियां को-ऑपरेटिव बैंकों से मिले ब्याज पर टैक्स डिडक्शन (Tax Deduction) का दावा कर सकती हैं, भले ही उन्होंने पुराने असेसमेंट इयर्स (Assessment Years) के लिए टैक्स रिटर्न देर से भरे हों।

को-ऑप सोसाइटियों के हक में आया फैसला

यह फैसला Sterling Court F Wing Co-operative Housing Society Ltd. के एक मामले से जुड़ा है। इस सोसाइटी ने असेसमेंट ईयर (AY) 2012-13 के लिए अपना टैक्स रिटर्न तय समय सीमा के बाद फाइल किया था। जब उन्होंने Saraswat Co-operative Bank से कमाए ₹2.66 लाख के ब्याज पर सेक्शन 80P के तहत डिडक्शन का दावा किया, तो सेंट्रल प्रोसेसिंग सेंटर (CPC) ने इसे सेक्शन 143(1) के तहत ऑटोमेटिकली रिजेक्ट कर दिया था।

ITAT के अहम निष्कर्ष

ट्रिब्यूनल ने इन रिजेक्शन्स को दो मुख्य वजहों से खारिज किया। पहला,涉及 असेसमेंट इयर्स (AY 2012-13, AY 2013-14, और AY 2014-15) के लिए, मौजूदा टैक्स कानूनों में सेक्शन 80P डिडक्शन पाने के लिए समय पर फाइलिंग को जरूरी नहीं बताया गया था। ट्रिब्यूनल ने CBDT के सर्कुलर नंबर 13/2023 का भी हवाला दिया, जो पुराने टैक्स पीरिएड्स के लिए अधिक फ्लेक्सिबल यानी लचीले रुख का समर्थन करता है।

दूसरा, ITAT ने इस बात की पुष्टि की कि को-ऑपरेटिव बैंकों के तौर पर काम करने वाले संस्थानों से मिला ब्याज, सेक्शन 80P(2)(d) के तहत डिडक्शन के लिए क्वालिफाई करता है, भले ही उनके पास रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) का लाइसेंस हो या न हो। ट्रिब्यूनल ने इस बात पर भी जोर दिया कि सेक्शन 80P(4) जैसी जटिल टैक्स संबंधी सवालों को ऑटोमेटिक टैक्स प्रोसेसिंग के जरिए हल नहीं किया जा सकता।

आगे क्या? एक्सपर्ट्स की राय

टैक्स एक्सपर्ट्स इस फैसले को टैक्सपेयर्स के पक्ष में एक पॉजिटिव कदम मान रहे हैं। हालांकि, उनका कहना है कि यह मामला अभी भी काफी विवादित है और अलग-अलग हाई कोर्ट्स के फैसले भी अलग-अलग आए हैं। सेक्शन 80P(2)(d) के साथ सेक्शन 80P(4) के नियमों को स्पष्ट करने के लिए सुप्रीम कोर्ट से अंतिम फैसले का इंतजार है। इन ट्रिब्यूनल जीतों के बावजूद, एक्सपर्ट्स यह सलाह देते हैं कि को-ऑपरेटिव सोसाइटियों को किसी भी संभावित समस्या से बचने के लिए समय पर अपने टैक्स रिटर्न फाइल करने चाहिए और डिडक्शन क्लेम को सपोर्ट करने के लिए अपने रिकॉर्ड्स को अच्छी तरह मेंटेन करना चाहिए।

Disclaimer:This content is for informational purposes only and does not constitute financial or investment advice. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making decisions. Investments are subject to market risks, and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors are not liable for any losses. Accuracy and completeness are not guaranteed, and views expressed may not reflect the publication’s editorial stance.