टाटा ट्रस्ट्स पर मंडराया कानूनी संकट
टाटा ग्रुप के लिए मुश्किलें बढ़ गई हैं, क्योंकि टाटा ट्रस्ट्स पर अब कानूनी शिकंजा कस गया है। बॉम्बे हाई कोर्ट में एक रिट पिटीशन (Writ Petition) दायर की गई है, जिसमें 8 मई को होने वाली टाटा ट्रस्ट्स की बोर्ड मीटिंग को रोकने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि ट्रस्ट ने महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट्स एक्ट, 2025 के संशोधित नियमों का उल्लंघन किया है।
ट्रस्टी एक्ट का उल्लंघन और लिस्टिंग पर असर?
आरोप है कि सर रतन टाटा ट्रस्ट (SRTT) ने ट्रस्टी एक्ट की धारा 30A(2) का उल्लंघन किया है। इस एक्ट में 1 सितंबर, 2025 से लागू हुए बदलाव के तहत, परपेचुअल (आजीवन) ट्रस्टियों की संख्या बोर्ड के 25% से ज्यादा नहीं हो सकती। याचिका के अनुसार, SRTT में 6 बोर्ड सदस्यों में से 3 परपेचुअल ट्रस्टी हैं, जो कि तय सीमा से 50% ज्यादा है। अगर कोर्ट तुरंत सुनवाई करता है, तो 8 मई की मीटिंग में लिए गए फैसले, जिनमें टाटा संस (Tata Sons) के बोर्ड में प्रतिनिधित्व जैसे अहम मुद्दे शामिल हैं, अमान्य हो सकते हैं।
गवर्नेंस पर गहराते सवाल और RBI की डेडलाइन
यह कानूनी मामला टाटा ग्रुप के भीतर गवर्नेंस (Governance) से जुड़े गहरे मुद्दों को उजागर करता है। ट्रस्टियों की नियुक्ति और नियमों के पालन को लेकर पहले से ही सवाल उठ रहे थे। इन सबके बीच, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने ऊपरी-स्तर की नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) के लिए जुलाई 2026 तक लिस्टिंग की अनिवार्यता को लेकर स्पष्ट किया है। टाटा संस, जो एक प्रमुख NBFC है, इस डेडलाइन को पूरा करने के लिए दबाव में है। कंपनी द्वारा लिस्टिंग से बचने के लिए एनबीएफसी के तौर पर डी-रजिस्टर करने की कोशिशों को RBI के रुख के चलते झटका लगा है, जिससे उसका प्राइवेट बने रहना मुश्किल हो रहा है।
इन अंदरूनी खींचतान से क्या है खतरा?
सूत्रों के मुताबिक, ट्रस्टियों के बीच टाटा संस की लिस्टिंग को लेकर मतभेद हैं। नोएल टाटा (Noel Tata) कंपनी को प्राइवेट रखने के पक्ष में बताए जाते हैं, जबकि वेणु श्रीनिवासन (Venu Srinivasan) और विजय सिंह (Vijay Singh) पब्लिक ऑफरिंग के लिए इच्छुक हैं। यह अंदरूनी कलह रणनीतिक फैसलों में बाधा डाल रही है और टाटा संस को जुलाई 2026 की RBI की स्ट्रिक्ट लिस्टिंग डेडलाइन को पूरा करने से रोक सकती है। इससे कंपनी की ट्रांसपेरेंसी (Transparency) और माइनॉरिटी शेयरहोल्डर्स (Minority Shareholders) के लिए वैल्यू पर भी सवाल खड़े होते हैं।
रेगुलेटरी बदलाव और भविष्य का रास्ता
महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट एक्ट में हुए बदलाव चैरिटेबल ट्रस्ट्स में जवाबदेही और रोटेशन (Rotation) को बढ़ाने के उद्देश्य से किए गए हैं। ये बदलाव परपेचुअल ट्रस्टीशिप से हटकर एक नए दौर की ओर इशारा करते हैं। अगर ट्रस्ट नियमों का पालन नहीं करते, तो चैरिटी कमिश्नर (Charity Commissioner) हस्तक्षेप कर सकता है। यह स्थिति टाटा ट्रस्ट्स के लिए एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि उन्हें अपनी पुरानी व्यवस्थाओं को आधुनिक कानूनी और नैतिक मानकों के अनुरूप ढालना होगा। प्रॉक्सी एडवाइजरी फर्म (Proxy Advisory Firms) जैसे InGovern ने भी लिस्टेड टाटा कंपनियों के डायरेक्टर्स से शेयरहोल्डर्स के हित में लिस्टिंग का समर्थन करने की अपील की है।
