रद्द हुए दंगा केस की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने चंडीगढ़ प्रशासन की उस अपील को सुनने के लिए सहमति जताई है, जिसमें पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने दंगा और गैरकानूनी जमावड़े का एक मामला रद्द कर दिया था। इस मामले में पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान और आम आदमी पार्टी (आप) के अन्य नेता आरोपी हैं। यह केस बिजली की दरों में बढ़ोतरी के खिलाफ 2020 के एक विरोध प्रदर्शन से जुड़ा है।
प्रशासन ने हाईकोर्ट के फैसले को दी चुनौती
भारत के मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली एक पीठ अब इस बात पर विचार करेगी कि क्या हाईकोर्ट ने फर्स्ट इंफॉर्मेशन रिपोर्ट (FIR) को रद्द करने में गलती की। चंडीगढ़ प्रशासन, जिसकी ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए, कानूनी कार्यवाही में और प्रतिवादियों को जोड़ने की भी मांग कर रहा है।
विरोध प्रदर्शन की पृष्ठभूमि
2020 में चंडीगढ़ पुलिस ने आप नेताओं और कार्यकर्ताओं द्वारा पंजाब के मुख्यमंत्री के निवास के पास विरोध प्रदर्शन करने के प्रयास के बाद FIR दर्ज की थी। खबरों के मुताबिक, अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए वाटर कैनन का इस्तेमाल किया था, जिससे कथित तौर पर पुलिसकर्मियों पर पथराव की घटनाएं हुईं।
केस रद्द करने के पीछे हाईकोर्ट का तर्क
नवंबर 2025 में, पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने FIR को रद्द करने की अनुमति दी थी। जस्टिस त्रिभुवन दहिया ने कहा था कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 के तहत निषेधाज्ञा आदेशों की अनुपस्थिति का मतलब है कि पुलिस कानूनी रूप से प्रदर्शनकारियों को नहीं रोक सकती थी। अदालत ने यह भी नोट किया कि पथराव के लिए किसी विशेष व्यक्ति की पहचान नहीं की गई थी और याचिकाकर्ताओं द्वारा हिंसा भड़काने का कोई सबूत नहीं था। इसलिए, हाईकोर्ट ने भीड़ के कार्यों को याचिकाकर्ताओं से जोड़ने के लिए अपर्याप्त आधार पाया और दंगे तथा पुलिसकर्मियों पर हमला करने के आरोपों को अप्रमाणित माना। पूर्व निषेधाज्ञा आदेशों की कमी के कारण गैरकानूनी जमावड़े की हिंसा के आरोप भी अमान्य कर दिए गए थे।
विरोध के अधिकार और कानून व्यवस्था पर असर
यह मामला विरोध के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के बीच संतुलन को दर्शाता है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला दंगा और गैरकानूनी जमावड़े के आरोपों को लागू करने के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम कर सकता है, खासकर तब जब निषेधाज्ञा आदेश लागू न हों और प्रदर्शन नेताओं द्वारा सीधे तौर पर हिंसा भड़काने का स्पष्ट प्रमाण न हो। इस फैसले पर भविष्य के राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों और कानून प्रवर्तन के कानूनी विकल्पों पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर बारीकी से नजर रखी जाएगी।
