सुप्रीम कोर्ट 13 जुलाई को एयरलाइंस की मनमानी कीमतों और अतिरिक्त शुल्कों के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करेगा। यह मामला डायनामिक प्राइसिंग और बैगेज पॉलिसी को चुनौती देता है, और भारतीय नागरिक उड्डयन क्षेत्र में अधिक पारदर्शिता और नियामक नियंत्रण की मांग करता है।
एयरलाइंस की मनमानी पर सुप्रीम कोर्ट का पहरा!
सुप्रीम कोर्ट 13 जुलाई को एक अहम याचिका पर सुनवाई करने वाला है, जिसका असर देश की प्राइवेट एयरलाइंस के टिकट बुकिंग और बैगेज पॉलिसी पर पड़ सकता है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच एक्टिविस्ट एस. लक्ष्मीनारायणन की दायर याचिका पर सुनवाई करेगी। इस याचिका में एयरलाइंस द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली डायनामिक प्राइसिंग (dynamic pricing) के तरीके और यात्रियों से वसूले जाने वाले अतिरिक्त शुल्कों (ancillary charges) में पारदर्शिता की कमी पर सवाल उठाए गए हैं।
कीमतों और बैगेज पॉलिसी को चुनौती
याचिका में कहा गया है कि एयरलाइंस उपभोक्ताओं का शोषण कर रही हैं। इसमें खासकर बैगेज पॉलिसी में बदलावों का जिक्र है। कई एयरलाइंस ने इकोनॉमी क्लास के यात्रियों के लिए फ्री चेक-इन बैगेज लिमिट 25 किलो से घटाकर 15 किलो कर दी है। याचिकाकर्ता का यह भी तर्क है कि यात्रियों को एक ही पीस चेक-इन बैगेज की अनुमति देना और कम सामान ले जाने वाले यात्रियों को कोई छूट या लाभ न देना भेदभावपूर्ण है।
इससे पहले भी कोर्ट ने एक ही रूट पर एक ही दिन बुक की गई समान फ्लाइट्स के टिकट दामों में भारी अंतर पर चिंता जताई थी। याचिकाकर्ता का कहना है कि जब तक कोई स्वतंत्र नियामक संस्था (regulatory body) नहीं होगी जो एयरफेयर (airfare) को कैप (cap) करे या अतिरिक्त शुल्कों पर नजर रखे, एयरलाइंस मनमानी करती रहेंगी, जो सीधे तौर पर उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन है।
नए कानून और पुरानी चिंताएं
सरकार ने इस मामले में 'भारतीय वायुयान अधिनियम 2024' का जिक्र किया है, जो जनवरी 2025 में लागू हुआ। हालांकि, याचिकाकर्ता के वकील का कहना है कि नए कानूनों के बावजूद, 1937 के पुराने एयरक्राफ्ट एक्ट के तहत नियमों का पालन ठीक से नहीं हो रहा है। आने वाली सुनवाई में यह तय होगा कि क्या नया कानून इन उपभोक्ता शिकायतों को दूर करने के लिए काफी है, या फिर कोर्ट और नियामक संस्थाओं को हस्तक्षेप करने की जरूरत पड़ेगी।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
एविएशन सेक्टर के निवेशकों को इस फैसले पर बारीकी से नजर रखनी होगी। अगर कोर्ट एयरफेयर पर कैप लगाने या अतिरिक्त कमाई के तरीकों को बदलने का आदेश देता है, तो एयरलाइंस कंपनियों के मुनाफे (profit margins) पर दबाव आ सकता है। ये एयरलाइंस इन हाई-मार्जिन रेवेन्यू स्ट्रीम्स पर काफी निर्भर करती हैं। कोर्ट का रुख यह तय करेगा कि भविष्य में भारतीय एयरलाइंस के लिए प्राइसिंग की कितनी गुंजाइश रहेगी।
