सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: दिवालियापन कानून (IBC) में अब प्रक्रिया पालन और दावों की वैधता पर कड़ा पहरा

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AuthorMehul Desai|Published at:
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: दिवालियापन कानून (IBC) में अब प्रक्रिया पालन और दावों की वैधता पर कड़ा पहरा

सुप्रीम कोर्ट ने भारत के दिवालियापन कानून (IBC) के प्रति अपने दृष्टिकोण में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। अब से, प्रक्रिया के पालन और दावों की वैधता पर कड़ाई से जोर दिया जाएगा। 2025 के नए फैसलों के अनुसार, रिजॉल्यूशन प्लान पर वोटिंग से पहले नियामक (regulatory) मंजूरी अनिवार्य होगी और सट्टेबाजी करने वाले निवेशकों को वित्तीय लेनदार (financial creditor) का दर्जा नहीं मिलेगा। इस बदलाव से बैंकपप्टसी रिजॉल्यूशन की प्रक्रिया प्रभावित होगी, जिसमें लेनदारों के वाणिज्यिक निर्णयों के साथ-साथ कानूनी शुद्धता को भी प्राथमिकता दी जाएगी।

क्या हैं नए नियम?

भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में दिवालियापन और दिवालियापन संहिता (IBC) के कार्यान्वयन के तरीके को फिर से परिभाषित किया है। अब अदालतों का जोर लेनदारों की 'वाणिज्यिक बुद्धिमत्ता' (commercial wisdom) पर कम और प्रक्रियात्मक व कानूनी शुद्धता पर अधिक होगा। निवेशकों के लिए, इसका मतलब है कि दिवालियापन समाधान प्रक्रिया अब अधिक अनुमानित, लेकिन शायद थोड़ी जटिल हो गई है, क्योंकि अदालतें अब अन्य आवश्यक कानूनों के अनुपालन को प्राथमिकता दे रही हैं।

जरूरी रेगुलेटरी क्लीयरेंस

नियामक (regulatory) मंजूरी के समय को लेकर एक बड़ा बदलाव आया है। 29 जनवरी 2025 के 'इंडिपेंडेंट शुगर कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम गिरीश श्रीराम जुनेजा' मामले में, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स (Committee of Creditors) द्वारा रिजॉल्यूशन प्लान पर वोट करने से पहले भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) की मंजूरी प्राप्त की जानी चाहिए। यह तर्क कि ऐसी मंजूरी बाद में ली जा सकती है, खारिज कर दिया गया। कोर्ट ने यह स्थापित किया है कि IBC कंपनियों को अन्य वैधानिक दायित्वों से छूट नहीं देता, जिसमें प्रतिभूति (securities) और पर्यावरण नियम भी शामिल हैं। इससे यह सुनिश्चित होगा कि रिजॉल्यूशन प्लान अंतिम होने के बाद नियामक बाधाओं के कारण अटके नहीं।

वित्तीय लेनदार की परिभाषा में बदलाव

न्यायपालिका ने दिवालियापन कार्यवाही शुरू करने वालों के लिए भी स्पष्ट सीमाएं तय कर दी हैं। सितंबर 2025 के 'मानसी ब्रार फर्नांडीस बनाम शुभ्रा शर्मा' फैसले में, कोर्ट ने वास्तविक घर खरीदारों और निश्चित रिटर्न की तलाश करने वाले सट्टेबाजी निवेशकों के बीच अंतर किया। फैसले में कहा गया है कि IBC का उद्देश्य व्यवहार्य परियोजनाओं (viable projects) को पुनर्जीवित करना है, न कि केवल ऋण वसूली (debt recovery) के एक सरल साधन के रूप में कार्य करना। नतीजतन, ऐसे दावों की अब अधिक गहन जांच की जा रही है, जिनमें निश्चित रिटर्न या बाय-बैक समझौते शामिल हैं, ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि क्या दावा करने वाला व्यक्ति IBC की धारा 7 को लागू करने का हकदार एक वैध वित्तीय लेनदार है।

जवाबदेही और 'क्लीन स्लेट' सिद्धांत

दिवालियापन व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए, कोर्ट ने IBC की धारा 32A के तहत 'क्लीन स्लेट' (clean slate) सिद्धांत को मजबूत किया है। सितंबर 2025 के 'कल्याणी ट्रांसको बनाम भूषण पावर एंड स्टील लिमिटेड' फैसले में देखा गया कि एक बार रिजॉल्यूशन प्लान स्वीकृत हो जाने के बाद, यह अंतिम माना जाएगा और दावों को फिर से नहीं खोला जा सकेगा। हालांकि, यह सुरक्षा केवल कॉर्पोरेट देनदार (corporate debtor) तक ही सीमित है। अप्रैल 2025 के 'पिरामल कैपिटल एंड हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड बनाम 63 मून्स टेक्नोलॉजीज लिमिटेड' मामले में, कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि पूर्व प्रमोटर (promoters) धोखाधड़ी वाली गतिविधियों के लिए व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह बने रहेंगे। यह अंतर सुनिश्चित करता है कि कंपनी को भले ही नई शुरुआत मिले, लेकिन पिछले कुप्रबंधन या धोखाधड़ी के लिए जिम्मेदार व्यक्ति कानूनी परिणामों से नहीं बच पाएंगे। निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि ये कड़े प्रक्रियात्मक नियम भविष्य के दिवालियापन समाधानों की समय-सीमा और सफल निष्पादन को कैसे प्रभावित करते हैं, क्योंकि अल्पावधि में अधिक जांच से समाधान प्रक्रिया की अवधि बढ़ सकती है।

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