सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जजों की रिटायरमेंट एज 60 से बढ़ाकर 61 साल करने पर विचार करने को कहा है। यह बदलाव 1 अप्रैल 2026 से लागू हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्यों को दो हफ्तों के अंदर इस प्रस्ताव पर अपना अंतिम जवाब देना होगा।
Detailed Coverage
जजों की रिटायरमेंट एज बढ़ाने पर सुप्रीम कोर्ट की पहल
सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा कदम उठाते हुए सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को जजों की रिटायरमेंट एज (Retirement Age) बढ़ाने पर विचार करने का निर्देश दिया है। कोर्ट का प्रस्ताव है कि जजों की उम्र सीमा को 60 साल से बढ़ाकर 61 साल कर दिया जाए। इस बदलाव को 1 अप्रैल 2026 से लागू करने का सुझाव दिया गया है।
दो हफ्तों में राज्यों को देना होगा जवाब
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने यह निर्देश जारी किया है। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अपने संबंधित हाई कोर्ट से सलाह-मशविरा करके इस प्रस्ताव पर अपना जवाब कोर्ट में दर्ज कराना होगा। इसके लिए उन्हें दो हफ्तों का समय दिया गया है। जिन राज्यों और हाई कोर्ट ने पहले ही उम्र बढ़ाने का समर्थन किया है, उन्हें केवल अपनी सहमति की औपचारिक घोषणा करनी होगी। कोर्ट का जोर इस बात पर है कि न्यायिक प्रशासन में एकरूपता लाने के लिए सभी को मिलकर एक राय बनानी चाहिए।
अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नियम
यह कदम भारत में जजों की रिटायरमेंट पॉलिसी में मौजूद बड़े अंतर को दूर करने की कोशिश है। कुछ राज्य, जैसे तेलंगाना और मध्य प्रदेश, पहले ही अनुभवी जजों को बनाए रखने के लिए रिटायरमेंट एज बढ़ाने की दिशा में कदम उठा चुके हैं। वहीं, पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट जैसे कुछ जगहों पर अभी भी रिटायरमेंट एज 60 साल ही है, क्योंकि इसे राज्य के अन्य सरकारी कर्मचारियों की रिटायरमेंट एज के बराबर रखा गया है। सुप्रीम कोर्ट की यह पहल इन विभिन्न मतों में संतुलन बनाने और न्यायिक क्षमता को बढ़ाने के लक्ष्य से की गई है।
कानूनी व्यवस्था पर असर
वरिष्ठ जजों को लंबे समय तक बनाए रखने की क्षमता सीधे तौर पर करियर की अवधि और वर्कफोर्स प्लानिंग से जुड़ी है। एक समान बदलाव को आगे बढ़ाकर, न्यायपालिका स्टाफ की कमी को कम करने और जिम्मेदारियों के हस्तांतरण को सुचारू बनाने की उम्मीद कर रही है। कानूनी क्षेत्र के निवेशक और विश्लेषकों को आने वाले हफ्तों में विभिन्न राज्यों के जवाबों पर नजर रखनी चाहिए। इससे यह स्पष्ट होगा कि क्या 61 साल की उम्र पर राष्ट्रीय सहमति बन पाती है या फिर 62 साल की मांग पर और अधिक कानूनी मंथन की आवश्यकता होगी।
