सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) से जवाब मांगा है कि ₹1,000.69 करोड़ का पर्यावरण राहत फंड (Environmental Relief Fund) अब तक इस्तेमाल क्यों नहीं हुआ? इस जांच से पब्लिक लायबिलिटी इंश्योरेंस एक्ट, 1991 के अमल पर सवाल खड़े हो गए हैं। कोर्ट के इस फैसले से पर्यावरण उपकर (environmental levies) के प्रबंधन में पारदर्शिता बढ़ने और भविष्य में इन पैसों के इस्तेमाल पर कड़ी निगरानी की उम्मीद है।
पर्यावरण उपकर (Environmental Levies) की पड़ताल
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पर्यावरण राहत फंड की समीक्षा शुरू की है। कोर्ट ने केंद्र सरकार और सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) से पब्लिक लायबिलिटी इंश्योरेंस एक्ट, 1991 के तहत जमा किए गए फंड की स्थिति पर जवाब मांगा है। कोर्ट को सौंपी गई रिपोर्टों से पता चला है कि 2021 तक इस फंड में करीब ₹1,000.69 करोड़ जमा हो चुके थे। हालांकि, एनवायरमेंटल रिलीफ फंड स्कीम, 2008 के बावजूद, कोर्ट ने पाया कि इस पैसे का पर्यावरण संरक्षण के लिए इस्तेमाल होने का बहुत कम सबूत मिला है।
यह फंड खतरनाक पदार्थों से जुड़े औद्योगिक हादसों के पीड़ितों को तत्काल राहत देने के लिए बनाया गया है। चूंकि ये फंड उद्योगों से वसूले जाते हैं, इसलिए इनके इस्तेमाल में कमी वर्तमान प्रशासनिक तंत्र की दक्षता पर सवाल खड़े करती है। चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाला बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने अब संबंधित अधिकारियों को एक विस्तृत हलफनामा (affidavit) दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस हलफनामे में मौजूदा योजनाओं और इन बड़ी रकमों के प्रबंधन के बारे में जानकारी देनी होगी। यह कानूनी जांच, खतरनाक उद्योगों में काम करने वाले निवेशकों और कंपनियों के लिए एक संकेत हो सकती है कि पर्यावरण उपकर के लिए कड़े रेगुलेटरी अनुपालन (regulatory compliance) और रिपोर्टिंग की जरूरतें बढ़ सकती हैं।
व्यापक रेगुलेटरी और इकोलॉजिकल फैसले
राहत फंड की वित्तीय जांच के अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने कई अन्य मामलों पर भी गौर किया है, जिनका क्षेत्रीय बुनियादी ढांचे (infrastructure) और पर्यावरण अनुपालन पर असर पड़ता है। कोर्ट ने पटना में छह हफ्तों के भीतर अनधिकृत ढांचों को हटाने का आदेश दिया है, जिसमें नौजर घाट और नूरपुर घाट के बीच अतिक्रमण को निशाना बनाया गया है। इसके अलावा, वृंदावन (मथुरा जिला) क्षेत्र में किसी भी और निर्माण पर रोक लगा दी गई है, जिसका कारण बढ़ते निर्माण कार्य से यमुना नदी का चैनल संकरा होना बताया गया है। कोर्ट ने नदी के इकोलॉजिकल प्रवाह (ecological flow) को बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया, जिससे क्षेत्र की स्थानीय विकास परियोजनाओं और बुनियादी ढांचे की योजना पर काफी दबाव पड़ेगा।
अनुपालन के लिए अगले कदम
पर्यावरण वित्त (environmental finance) और भूमि उपयोग (land use) के अलावा, कोर्ट ने दो-स्तरीय मेडिकल रिव्यू बोर्ड की स्थिति की भी समीक्षा की। ये बोर्ड उन मरणासन्न (terminally ill) रोगियों के लिए जीवन रक्षक प्रणाली हटाने के अनुरोधों का मूल्यांकन करने के लिए आवश्यक हैं। जबकि अधिकांश राज्यों ने इन बोर्डों के गठन के मार्च 2026 के निर्देश का पालन किया है, कोर्ट ने विशेष रूप से मिजोरम और सिक्किम को तत्काल अनुपालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है। निवेशक पर्यावरण राहत फंड को लेकर आने वाले सरकारी हलफनामे पर नजर रख सकते हैं, क्योंकि कोर्ट के निष्कर्ष संभवतः भविष्य में CPCB द्वारा पर्यावरण उपकर की प्रोसेसिंग, ऑडिट और उपयोग के तरीके को निर्धारित करेंगे।
