सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से नेशनल हाईवे एक्ट में बदलाव की मांग की है। कोर्ट चाहता है कि ज़मीन अधिग्रहण के मुआवज़े से जुड़े मामलों में अफसरों की बजाय न्यायिक अधिकारी फैसला करें। इस कदम से किसानों को इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए ली गई ज़मीन का सही मूल्यांकन मिलेगा। सरकार ने कहा है कि वो इस पर विचार कर रही है।
Detailed Coverage
ज़मीन के मुआवज़े में हो रहा था भेदभाव?
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को नेशनल हाईवे एक्ट, 1956 पर अपनी मंशा साफ कर दी। कोर्ट का कहना है कि ज़मीन के मुआवज़े की रकम तय करने की मौजूदा प्रक्रिया में न्यायिक दखल की कमी है। चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि ज़मीन अधिग्रहण जैसे महत्वपूर्ण मामलों में, जहां कानूनी और आर्थिक अधिकार दांव पर लगे हों, सरकारी अफ़सरों को अंतिम फैसला लेने का अधिकार देना सही नहीं है।
एक्ट और दूसरे कानूनों में बड़ा अंतर
कोर्ट ने पाया कि नेशनल हाईवे एक्ट और भारत के दूसरे भूमि अधिग्रहण कानूनों में बड़ा अंतर है। जहां दूसरे कानूनों में मुआवज़े के फैसले के लिए न्यायिक अधिकारियों की ज़रूरत होती है, वहीं हाईवे एक्ट में यह पावर प्रशासनिक अधिकारियों को दी गई है। जजों ने इस व्यवस्था को 'अस्वीकार्य' बताया है। कोर्ट ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि नेशनल हाईवे प्रोजेक्ट्स के लिए अधिग्रहित की गई ज़मीन अक्सर अपनी लोकेशन और कमर्शियल संभावनाओं के कारण बहुत कीमती होती है।
ऐसी खबरें आती रही हैं कि किसानों को मौजूदा नौकरशाही व्यवस्था के तहत बाज़ार भाव या अन्य कानूनी फायदे जैसे सोलेशन (solatium) और ब्याज ठीक से नहीं मिल पाते। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम यह सुनिश्चित करने के लिए है कि ज़मीन मालिकों को कानूनी तौर पर मिलने वाला पूरा मुआवज़ा मिले। इससे लंबे समय से चली आ रही देरी और मुकदमेबाज़ी पर भी लगाम लगेगी, जो इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट में बाधा डालती आई है।
सरकार का जवाब और आगे क्या?
केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने बेंच को बताया कि सरकार पहले से ही एक्ट में संशोधन पर विचार कर रही है। कोर्ट ने सरकार को इन कानूनी बदलावों को शुरू करने के लिए वक़्त दिया है, बजाय इसके कि वह अभी कोई सीधा आदेश दे। यह इशारा करता है कि सरकार एक व्यवस्थित कानूनी सुधार की ओर बढ़ रही है, जिससे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए मुआवज़े की प्रक्रियाएं तय हो सकेंगी।
इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर से जुड़े निवेशकों और कंपनियों के लिए यह डेवलपमेंट बहुत अहम है। अगर एक्ट में बदलाव होता है, तो इससे ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रियाओं में ज़्यादा पारदर्शिता और कानूनी निश्चितता आएगी। हालांकि, इससे भविष्य के हाईवे प्रोजेक्ट्स के समय या लागत पर असर पड़ सकता है, लेकिन यह लंबे समय से चली आ रही मुकदमेबाज़ी और ज़मीन से जुड़े विवादों के जोखिम को कम करेगा, जो अक्सर निर्माण में देरी का कारण बनते रहे हैं। निवेशकों को संसद के आगामी सत्रों में प्रस्तावित संशोधनों की प्रगति पर नज़र रखनी चाहिए, क्योंकि न्यायिक निर्णय की ओर कोई भी बदलाव ज़मीन अधिग्रहण की लागत के लिए एक ज़्यादा मानक और अनुमानित ढांचा तैयार करेगा।
