सुप्रीम कोर्ट ने रेल यात्रियों और उनके परिवारों को बड़ी राहत देते हुए फैसला सुनाया है कि ट्रेन एक्सीडेंट में मरने वाले यात्रियों के परिवार मुआवज़े का दावा कर सकते हैं, भले ही यात्री के पास वैध टिकट न हो। इस फैसले से पहले निचली अदालतों ने ऐसे कई मामलों में टिकट न होने के आधार पर मुआवज़े के दावों को खारिज कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: टिकट की ज़रूरत नहीं!
सुप्रीम कोर्ट ने रेल हादसों में जान गंवाने वाले यात्रियों के परिवारों के लिए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस संजय Karol और जस्टिस N Kotiswar Singh की बेंच ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी यात्री की ट्रेन दुर्घटना में मृत्यु हो जाती है, तो उसके परिवार को मुआवज़ा देने से केवल इसलिए इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि यात्री के पास टिकट नहीं था।
निचली अदालतों के फैसलों को पलटा
यह फैसला पहले के कई फैसलों के उलट है, जिनमें रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल (Railway Claims Tribunal) और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने टिकट न होने को मुआवज़ा न देने का आधार माना था। यह मामला 2015 में अहमदाबाद-हावड़ा मेल से गिरे यात्री चंद्रकांत ठक्कर की मौत से जुड़ा था। उनके परिवार का दावा सिर्फ इसलिए खारिज कर दिया गया था क्योंकि वे साबित नहीं कर पाए कि वह वैध यात्री थे। सुप्रीम कोर्ट ने अब रेलवे को दिवंगत यात्री की विधवा को ₹8 लाख का भुगतान करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि तकनीकी खामियों के कारण कल्याणकारी कानून (welfare law) के उद्देश्य को बाधित नहीं किया जाना चाहिए।
'नो-फॉल्ट लायबिलिटी' का सिद्धांत
रेलवे एक्ट की धारा 124A के तहत, दुर्घटनाओं के लिए मुआवज़े के दावों में 'नो-फॉल्ट लायबिलिटी' (no-fault liability) का सिद्धांत लागू होता है। इसका मतलब है कि पीड़ितों या उनके परिवारों को मुआवज़ा पाने के लिए यह साबित करने की ज़रूरत नहीं है कि रेलवे अथॉरिटीज़ की कोई गलती थी। इस नए फैसले के साथ, अदालत ने यह भी साफ कर दिया है कि एक बार जब कोई दावेदार विश्वसनीय हलफनामा (affidavit) देता है और दुर्घटना के हालात बताता है, तो भारतीय रेलवे पर यह साबित करने की ज़िम्मेदारी आ जाती है कि व्यक्ति वैध यात्री नहीं था।
यात्री सुरक्षा और भविष्य पर असर
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के ज़रिए ट्रेन में भीड़भाड़ जैसी यात्री सुरक्षा संबंधी चिंताओं पर भी प्रकाश डाला। कोर्ट ने माना कि रेलवे मैनुअल में सुरक्षा और टिकट चेकिंग के नियम हैं, लेकिन उनका व्यावहारिक कार्यान्वयन एक चुनौती है। बेंच ने यह भी सुझाव दिया कि भारतीय रेलवे को 'सेकंड-क्लास पैसेंजर' जैसे शब्दों का इस्तेमाल बंद करना चाहिए, क्योंकि यह आधुनिक गरिमा और समानता के मूल्यों के अनुरूप नहीं है।
यह फैसला परिवारों को राहत ज़रूर देता है, लेकिन कोर्ट ने यात्रियों को अनावश्यक जोखिम से बचने की भी सलाह दी है। भारतीय रेलवे के लिए, इस निर्णय से क्लेम आवेदनों को प्रोसेस करने के तरीके में बदलाव आ सकता है। भविष्य में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल अपनी आंतरिक गाइडलाइंस को कैसे समायोजित करता है और क्या इससे देश भर में लंबित दुर्घटना मामलों का तेज़ी से समाधान होता है।
