सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: प्रमोटर अब IBC का इस्तेमाल कर होम बायर्स से नहीं बचेंगे!

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: प्रमोटर अब IBC का इस्तेमाल कर होम बायर्स से नहीं बचेंगे!

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि इनसॉल्वेंसी मोरैटोरियम (Insolvency Moratorium) सिर्फ कंपनियों को बचाता है, उनके प्रमोटरों या डायरेक्टर्स को नहीं। इसका मतलब है कि डेवलपर अगर इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया से गुजर रहा हो, तब भी होम बायर्स मैनेजमेंट के खिलाफ कंज्यूमर कोर्ट में केस जारी रख सकते हैं। इस फैसले से बिल्डरों के लिए दिवालियापन का इस्तेमाल खुद को कानूनी जवाबदेही से बचाने के लिए ढाल के तौर पर करना अब मुश्किल होगा।

Detailed Coverage

रियल एस्टेट सेक्टर के लिए सुप्रीम कोर्ट का एक बड़ा फैसला आया है। कोर्ट ने साफ किया है कि कंपनी चलाने वाले लोग, जिनमें प्रमोटर और डायरेक्टर शामिल हैं, होम बायर्स की लीगल कार्रवाई को रोकने के लिए इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) का इस्तेमाल नहीं कर सकते। इस जजमेंट ने यह स्पष्ट किया है कि इनसॉल्वेंसी मोरैटोरियम के तहत मिलने वाली सुरक्षा सिर्फ कंपनी, यानी कॉरपोरेट डेटर (Corporate Debtor) के लिए होती है, न कि उसके मैनेजमेंट के लिए।

IBC मोरैटोरियम का दायरा समझाया

यह मामला IBC की धारा 14 से जुड़ा था, जो कंपनी के इनसॉल्वेंसी रेजोल्यूशन में जाने के बाद उस पर चल रही कानूनी कार्रवाई को रोक देती है। इसका मकसद रिकवरी प्लान तैयार होने तक कंपनी की संपत्तियों को सुरक्षित रखना होता है। हालांकि, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने पाया कि कानून मैनेजमेंट को यह छूट नहीं देता। कोर्ट ने कहा कि मोरैटोरियम का मकसद कंपनी की संपत्तियों की सुरक्षा करना है, न कि मैनेजमेंट को कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट जैसे अन्य कानूनों के तहत देनदारियों से पूरी तरह बचाना।

पेंडिंग कंज्यूमर केस पर असर

इस फैसले से नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रेड्रेसल कमीशन (NCDRC) का पिछला फैसला पलट गया है, जिसने बेंगलुरु स्थित मैंट्री टेक्नोलॉजी कंस्टेलेशन प्राइवेट लिमिटेड के प्रमोटरों और डायरेक्टर्स के खिलाफ केस रोक दिया था। अब इस फैसले के बाद उन व्यक्तियों के खिलाफ कंज्यूमर कार्रवाई फिर से शुरू हो सकेगी। उम्मीद है कि यह फैसला उन हजारों होम बायर्स की मदद करेगा, जिन्हें अक्सर डेवलपर के इनसॉल्वेंसी में जाने पर अपने कानूनी विकल्प सीमित नजर आते हैं।

इन्वेस्टर्स और होम बायर्स के लिए क्यों है यह अहम?

रियल एस्टेट कंपनियों में इन्वेस्ट करने वालों के लिए, यह रूलिंग प्रमोटरों की पर्सनल जवाबदेही को बढ़ाती है। पहले यह खतरा था कि मैनेजमेंट इनसॉल्वेंसी प्रोसेस का इस्तेमाल कंज्यूमर क्लेम्स को टालने या उनसे बचने के लिए कर सकता था, जिससे होम बायर्स के पास कोई खास रास्ता नहीं बचता था। मोरैटोरियम के दायरे को सीमित करके, सुप्रीम कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया है कि डेवलपर्स प्रोजेक्ट में देरी या अन्य कॉन्ट्रैक्ट फेल होने की पर्सनल जिम्मेदारी से बचने के लिए दिवालियापन का इस्तेमाल एक टूल के रूप में नहीं कर पाएंगे।

आगे, मार्केट पार्टिसिपेंट्स को यह देखना होगा कि यह प्रीसिडेंट (precedent) कर्ज में डूबे डेवलपर्स की रणनीति को कैसे प्रभावित करता है। गंभीर वित्तीय संकट का सामना कर रहे डेवलपर्स अब इनसॉल्वेंसी के पर्दे के पीछे अपनी मैनेजमेंट टीमों को शायद ही सुरक्षित रख पाएंगे। अगला महत्वपूर्ण कदम यह देखना होगा कि कंज्यूमर कोर्ट्स अभी भी इनसॉल्वेंसी से गुजर रहे अन्य डेवलपर्स से जुड़े पेंडिंग केस को कैसे हैंडल करते हैं, क्योंकि यह रूलिंग क्लेमेंट (claimants) के लिए एक स्पष्ट लीगल रोडमैप प्रदान करती है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.