सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: कॉर्पोरेट गारंटी अब 'फाइनेंशियल डेट' की श्रेणी में, लेनदारों के अधिकार हुए मजबूत!

LAWCOURT
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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: कॉर्पोरेट गारंटी अब 'फाइनेंशियल डेट' की श्रेणी में, लेनदारों के अधिकार हुए मजबूत!
Overview

सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए कॉर्पोरेट गारंटी से जुड़े देनदारियों को इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के तहत 'फाइनेंशियल डेट' की श्रेणी में रखा है। इस फैसले से लेनदारों (Lenders) के अधिकार मजबूत हुए हैं और Reliance Infratel Ltd. के इंसॉल्वेंसी मामले में SBI-led कंसोर्टियम की **₹3,628 करोड़** से अधिक की क्लेम को मान्यता मिली है।

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सुप्रीम कोर्ट का अहम निर्णय: इंसॉल्वेंसी में गारंटी का बदला मायने

सुप्रीम कोर्ट ने इंसॉल्वेंसी की प्रक्रिया में कॉर्पोरेट गारंटी के महत्व को एक बार फिर स्थापित किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) की धारा 5(8) के तहत, कॉर्पोरेट गारंटी से उत्पन्न होने वाली देनदारियों को 'फाइनेंशियल डेट' माना जाएगा। यह फैसला Reliance Infratel Limited (RITL) के चल रहे इंसॉल्वेंसी मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

SBI कंसोर्टियम को मिली बड़ी राहत

इस फैसले के साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) और नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) के उन पिछले फैसलों को पलट दिया है, जिनमें SBI-led कंसोर्टियम को फाइनेंशियल क्रेडिटर के तौर पर बाहर रखा गया था। इस कंसोर्टियम में बैंक ऑफ इंडिया, UCO बैंक, सिंडिकेट बैंक, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स और इंडियन ओवरसीज बैंक भी शामिल हैं। इन बैंकों ने RCOM और RTL जैसी ग्रुप कंपनियों के लिए RITL द्वारा दी गई गारंटी के आधार पर ₹3,628 करोड़ से अधिक की क्लेम किया था। अब इस फैसले के बाद SBI कंसोर्टियम को फाइनेंशियल क्रेडिटर के रूप में मान्यता मिल गई है, जिससे RITL की कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स (CoC) का पुनर्गठन होगा और इंसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी।

लेनदारों के लिए रास्ता हुआ साफ

यह निर्णय भारत के डिस्ट्रेस्ड एसेट्स (संकटग्रस्त संपत्ति) बाजार के लिए एक अहम समय पर आया है। सुप्रीम कोर्ट का IBC के उद्देश्यों को मजबूत करने पर लगातार जोर निवेशकों और लेनदारों के लिए अधिक निश्चितता लाने का प्रयास है। पहले, कॉर्पोरेट गारंटी से जुड़े दावों को अक्सर अपर्याप्त स्टैंपिंग या डिस्क्लोजर न होने जैसी तकनीकी खामियों के कारण खारिज कर दिया जाता था। हालांकि, वर्तमान फैसले ने इन तर्कों को अस्वीकार कर दिया है, यह कहते हुए कि अनुचित स्टैंपिंग किसी दस्तावेज को अमान्य नहीं करती और वित्तीय विवरणों में गैर-प्रकटीकरण (non-disclosure) के कारण भी लेनदार अपना दावा खो नहीं देता।

रिलायंस ग्रुप के लिए बनी रह सकती हैं कुछ चुनौतियाँ

हालांकि यह फैसला लेनदारों के पक्ष में है, फिर भी कुछ सवाल बने हुए हैं। Reliance ग्रुप से जुड़े मामलों में वित्तीय संकट और कानूनी लड़ाइयों का इतिहास रहा है। खासकर RITL द्वारा मार्च 2017 में गारंटी जारी करना, जबकि इसके लोन अगस्त 2016 तक पहले ही नॉन-परफॉर्मिंग (NPA) हो चुके थे, कुछ विवादों को जन्म दे सकता है। आलोचक इसे IBC की अन्य धाराओं के तहत प्राथमिकता या धोखाधड़ी वाला लेनदेन मान सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि मुख्य रूप से 'फाइनेंशियल डेट' वर्गीकरण पर ध्यान केंद्रित किया।

इंसॉल्वेंसी फ्रेमवर्क में बढ़ेगी स्पष्टता

कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल कायम करता है। यह इंसॉल्वेंसी फ्रेमवर्क के भीतर कॉर्पोरेट गारंटी जैसे अनुबंधों के महत्व को मजबूत करता है। इससे लेनदारों का भरोसा बढ़ेगा और डिस्ट्रेस्ड एसेट्स के समाधान में तेजी आने की उम्मीद है, क्योंकि गारंटी की वैधता को लेकर होने वाले मुकदमेबाजी में कमी आ सकती है। यह भारत में अधिक अनुमानित इंसॉल्वेंसी सिस्टम की ओर एक कदम है जो लेनदारों के पक्ष में है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.