सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: गाली-गलौज हमेशा अश्लीलता नहीं!

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AuthorAditya Rao|Published at:
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: गाली-गलौज हमेशा अश्लीलता नहीं!

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि सिर्फ गाली-गलौज कर देना भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा **294** के तहत अश्लीलता नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने यह भी बताया कि अशिष्ट भाषा और यौन रूप से स्पष्ट सामग्री, जिसका मकसद लोगों के दिमाग को भ्रष्ट करना हो, के बीच अंतर है। इस फैसले का असर भविष्य के आपराधिक मामलों में साफ सुनाई देगा।

अश्लीलता की कानूनी हद क्या है?

सुप्रीम कोर्ट ने अश्लीलता की कानूनी हदें तय करते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि सिर्फ अपमानजनक या अभद्र भाषा का इस्तेमाल अपने आप में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 294 के तहत अपराध नहीं है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच ने स्पष्ट किया कि किसी बात को कानूनी तौर पर अश्लील माने जाने के लिए, वह सिर्फ रूखी-सूखी या भद्दी नहीं होनी चाहिए। अश्लीलता की परिभाषा में आने के लिए, उस सामग्री का यौन रूप से स्पष्ट होना, यौन उत्तेजना पैदा करने के इरादे से होना, या सुनने वालों के दिमाग को भ्रष्ट या बिगाड़ने की क्षमता रखना ज़रूरी है।

अदालतों के लिए अहम गाइडलाइन

यह फैसला पूरे भारत की अदालतों के लिए एक महत्वपूर्ण गाइडलाइन है, खासकर ऐसे मामलों से निपटने में जिनमें आपत्तिजनक मौखिक बहस शामिल हो। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि भले ही भाषा आपत्तिजनक, असभ्य या अपमानजनक हो, अगर उसमें यौन स्पष्टता का तत्व नहीं है, तो उसे अश्लीलता के दायरे में नहीं लाया जा सकता। इस अंतर को स्थापित करके, कोर्ट का मकसद उन मामलों में अश्लीलता कानूनों के दुरुपयोग को रोकना है, जहाँ भाषा भले ही उत्तेजक हो, लेकिन सार्वजनिक नैतिकता के लिए वह ख़तरा पैदा नहीं करती जिसके लिए धारा 294 बनाई गई है।

जमीन विवाद की अपील का मामला

कोर्ट का यह स्पष्टीकरण तमिलनाडु में एक पुराने जमीन विवाद में फंसे 70 वर्षीय व्यक्ति की अपील के दौरान आया। यह मामला अगस्त 2017 में जमीन के मालिकाना हक को लेकर हुई शारीरिक झड़प के बाद शुरू हुआ था। शिकायतकर्ता ने आरोपी पर अपनी माँ को गाली-गलौज देने का आरोप लगाया था, जिसके कारण ट्रायल कोर्ट ने उसे अश्लीलता और आपराधिक धमकी दोनों मामलों में दोषी ठहराया था।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अश्लीलता और आपराधिक धमकी के आरोपों से बरी कर दिया, लेकिन उसने स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुंचाने के आरोप में दोषसिद्धि को बरकरार रखा। कोर्ट ने पाया कि इस घटना में शिकायतकर्ता को शारीरिक चोट आई थी। आरोपी की उम्र और स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए, कोर्ट ने उसकी सजा को 'उठने तक की कैद' में बदल दिया। इसके अलावा, आरोपी को दो महीने के भीतर ₹50,000 का जुर्माना भरने का भी आदेश दिया गया।

भविष्य के कानूनी मामलों पर असर

यह फैसला इस मायने में बहुत महत्वपूर्ण है कि यह निचली अदालतों के लिए एक स्पष्ट मिसाल कायम करता है। अब ऐसे मामलों में जहाँ आपत्तिजनक भाषा विवाद का मुख्य हिस्सा है, अदालतों को अधिक सटीकता से जांच करनी होगी। फैसले के अनुसार, अब सिर्फ आपत्तिजनक होने के कारण भाषा को अश्लीलता नहीं माना जाएगा, बल्कि इसके पीछे के इरादे और इस्तेमाल की गई भाषा की प्रकृति पर ध्यान देना होगा। इससे भविष्य में मौखिक झगड़ों से जुड़े आपराधिक मामलों में फैसला सुनाने के लिए एक अधिक वस्तुनिष्ठ ढांचा मिलेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.