सुप्रीम कोर्ट इस बात की समीक्षा कर रहा है कि 15 से 18 साल के किशोरों के बीच सहमति से बने रिश्तों के मामलों में POCSO एक्ट का इस्तेमाल कैसे किया जाए। कोर्ट ने कहा कि परिवार अक्सर भागकर शादी करने वाले मामलों को सुलझाने के लिए इस कानून का सहारा लेते हैं, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या इन मामलों को आपराधिक यौन उत्पीड़न माना जाना चाहिए। कोर्ट अब ऑटोमेटिक क्रिमिनलाइजेशन के बजाय अधिक संवेदनशील पुनर्वास उपायों की आवश्यकता का मूल्यांकन कर रहा है।
यौन अपराध और किशोर व्यवहार में अंतर
भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में वर्तमान में प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंसेस (POCSO) एक्ट, 2012 के दायरे की फिर से समीक्षा की जा रही है। खास तौर पर, किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने यौन संबंधों के मामलों में इसके इस्तेमाल पर गौर किया जा रहा है। सोमवार को जस्टिस बीवी नागरत्ना (BV Nagarathna) और जस्टिस आर. महादेवन (R Mahadevan) की बेंच ने चिंता जताई कि इस एक्ट के सख्त प्रावधानों का इस्तेमाल अक्सर माता-पिता तब करते हैं जब किशोर भागकर शादी कर लेते हैं, ताकि परिवार की इज्जत का मामला सुलझ सके।
प्रयोग और रिश्ते
कोर्ट की बेंच ने यौन शोषण और किशोरों के रिश्तों के बीच के अंतर को उजागर किया। जजों ने 15-18 साल की उम्र को 'प्रयोग' का दौर बताते हुए सवाल उठाया कि क्या किशोरों के भागकर शादी करने के हर मामले को POCSO एक्ट के तहत आना चाहिए। कोर्ट ने यह भी देखा कि ऐसे कई मामले सामने आते हैं जहां उन्हें आरोपियों को बरी करना पड़ता है, क्योंकि रिश्ते सहमति से बने होते हैं, भले ही अभिभावकों ने आपराधिक आरोप लगाए हों।
व्यवस्थागत चिंताएं और सुधार
यह समीक्षा कोलकाता हाईकोर्ट (Calcutta High Court) के एक पुराने फैसले से जुड़े मामले के तहत की जा रही है, जिसमें किशोर लड़कियों के व्यवहार पर बात की गई थी। सीनियर एडवोकेट माधवी दीवान (Madhavi Divan) ने इस मामले का प्रतिनिधित्व करते हुए कहा कि POCSO मामलों को संभालने के तरीके में एक बड़ी व्यवस्थागत कमी है, खासकर जब 17 और 18 साल के युवा सहमति से बनाए गए रिश्तों के लिए गंभीर आपराधिक दंड का सामना करते हैं। चर्चा का मुख्य बिंदु 2012 में बने दंडात्मक ढांचे पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय किशोर कल्याण, शिक्षा और पुनर्वास पर ध्यान केंद्रित करना था।
सरकारी प्रस्ताव
इस समीक्षा के हिस्से के रूप में, केंद्र सरकार ने सुझाव दिया कि मिडिल स्कूल स्तर से ही POCSO एक्ट के बारे में जागरूकता और शिक्षा कार्यक्रम शुरू किए जाएं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट मामलों की निगरानी के लिए एक केंद्रीकृत सरकारी डैशबोर्ड की प्रभावशीलता को लेकर संशय में था। बेंच ने बताया कि हाईकोर्ट के भीतर मौजूदा बाल अधिकार समितियों (child rights committees) और व्यक्तिगत राज्य प्रबंधन तंत्र (state management mechanisms) निरीक्षण के लिए पर्याप्त होने चाहिए। कोर्ट इन संवेदनशील मामलों को इस तरह से प्रबंधित करने के तरीकों की जांच जारी रखेगा, जिससे सहमति से रिश्तों में शामिल नाबालिगों को अनावश्यक आघात या दीर्घकालिक आपराधिक रिकॉर्ड का सामना न करना पड़े। अगली सुनवाई 17 जुलाई को निर्धारित है।
