सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें RJD प्रमुख लालू प्रसाद यादव की जमानत रद्द करने की मांग की गई थी। देवघर चारा घोटाला मामले में कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट को अगले छह महीने के भीतर उनकी लंबित आपराधिक अपील का निपटारा करने का निर्देश दिया है। इस फैसले से पूर्व मुख्यमंत्री को 2019 से मिली सजा के निलंबन के मामले में यथास्थिति बनी रहेगी।
लालू यादव को मिली जमानत, सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड सरकार की याचिका खारिज की
राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता लालू प्रसाद यादव को देवघर ट्रेजरी चारा घोटाला मामले में बड़ी राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी जमानत रद्द करने से इनकार कर दिया है। झारखंड सरकार की ओर से दायर उस याचिका को जस्टिस की बेंच ने खारिज कर दिया, जिसमें झारखंड हाईकोर्ट द्वारा 2019 में दी गई सजा के निलंबन को रद्द करने की मांग की गई थी। कोर्ट ने कहा कि सजा का निलंबन लगभग सात साल से प्रभावी है, इसलिए इसमें तत्काल हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं है।
अपील के निपटारे के लिए समय-सीमा तय
जमानत बरकरार रखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि कानूनी प्रक्रिया में हो रही देरी को दूर किया जाना चाहिए। कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट को निर्देश दिया है कि 2018 से लंबित आपराधिक अपील पर सुनवाई में तेजी लाई जाए। बेंच ने एक सख्त समय-सीमा तय करते हुए कहा कि हाईकोर्ट को छह महीने के भीतर सुनवाई पूरी कर फैसला सुनाना होगा, ताकि इस पुराने मामले का निपटारा हो सके।
सजा की गणना पर कानूनी बहस
इस मामले की जड़ें लालू प्रसाद यादव द्वारा काटी गई जेल की अवधि की गणना को लेकर थीं। झारखंड सरकार का तर्क था कि हाईकोर्ट का 2019 का फैसला उनके जेल के समय की गलत व्याख्या पर आधारित था। राज्य के प्रतिनिधि ने दलील दी कि चारा घोटाला के विभिन्न मामलों में मिली सजाओं को एक के बाद एक (consecutively) भुगताना चाहिए, न कि एक साथ (concurrently)। इसका मतलब होता कि उन्होंने अपनी आवश्यक सजा का आधा हिस्सा भी पूरा नहीं किया था, जो जमानत के लिए एक मानक मानदंड है।
इसके जवाब में, बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि सजाओं को लगातार या समवर्ती रूप से चलाने का सवाल एक जटिल कानूनी मुद्दा है, जिसे जमानत के चरण के बजाय अंतिम अपील सुनवाई के दौरान सुलझाया जाना चाहिए। बचाव पक्ष ने हाईकोर्ट की स्थापित प्रथाओं का भी हवाला दिया, जहां संबंधित मामलों में दोषी ठहराए गए अन्य व्यक्तियों को आधी सजा पूरी करने पर इसी तरह की राहत दी गई है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा जमानत आदेश को बरकरार रखने से अब सारा ध्यान हाईकोर्ट में होने वाली आगामी अंतिम अपील पर केंद्रित हो गया है, जो इस मामले के समाधान के लिए प्राथमिक निगरानी बिंदु बना रहेगा।
