IPS ट्रेनी की याचिका खारिज: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, बच्चे के जन्म के बाद ट्रेनिंग में शामिल होने की नहीं मिलेगी इजाज़त

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
IPS ट्रेनी की याचिका खारिज: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, बच्चे के जन्म के बाद ट्रेनिंग में शामिल होने की नहीं मिलेगी इजाज़त

सुप्रीम कोर्ट ने एक IPS प्रोबेशनर की बच्चे के जन्म के बाद ट्रेनिंग प्रोग्राम में शामिल होने की अर्ज़ी को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि ट्रेनिंग का एक तिहाई हिस्सा पहले ही पूरा हो चुका है और देर से आने से 95% अटेंडेंस का नियम प्रभावित होगा।

ट्रेनिंग में शामिल होने की मंशा पर फिरा पानी

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को 2023 बैच की IPS प्रोबेशनर उर्वशी सेंगर की नेशनल पुलिस एकेडमी में मौजूदा ट्रेनिंग सेशन में शामिल होने की अर्ज़ी को ठुकरा दिया। जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्र शेखर की बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा कि इस स्तर पर उन्हें शामिल करना अव्यावहारिक होगा, क्योंकि नौ हफ्ते की ट्रेनिंग के तीन हफ्ते पहले ही बीत चुके हैं।

1993 की सरकारी पॉलिसी पर उठा सवाल?

दरअसल, विवाद की जड़ 1993 की गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs) की एक ऑफिस मेमोरेंडम है, जिसके तहत महिला ट्रेनीज़ को बच्चे के जन्म के बाद एक साल का ब्रेक लेना अनिवार्य है। उर्वशी सेंगर, जिन्हें मध्य प्रदेश कैडर आवंटित हुआ है, ने सितंबर 2025 में बच्चे को जन्म दिया था और 22 जून 2026 को शुरू हुए ट्रेनिंग प्रोग्राम में शामिल होना चाहती थीं। उनका तर्क था कि वे मेडिकली फिट हैं। हालांकि, 1993 की इस पॉलिसी की वैधता को चुनौती देने वाला मामला फिलहाल सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) में लंबित है।

अटेंडेंस और ट्रेनिंग की इंटीग्रिटी सबसे ऊपर

केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अनिल कौशिक ने कोर्ट को बताया कि ट्रेनिंग प्रोग्राम में पूरा होने के लिए अनिवार्य रूप से 95% अटेंडेंस ज़रूरी है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि याचिकाकर्ता द्वारा मिस किए गए तीन हफ्तों में फिजिकल ट्रेनिंग और ज़रूरी फील्ड विजिट जैसे अहम हिस्से शामिल थे। कोर्ट ने इस दलील से सहमति जताते हुए कहा कि देर से एंट्री की इजाज़त देने से अधूरा प्रशिक्षण मिलेगा, जो ट्रेनी की अपनी प्रोफेशनल ज़रूरतों के लिए भी हानिकारक हो सकता है। हालांकि, बेंच ने इस हफ्ते की शुरुआत में चिंता जताई थी कि क्या 1993 की पॉलिसी पुरानी हो चुकी है और फिट कैंडिडेट्स को दंडित कर सकती है, लेकिन इस विशेष मामले में मौजूदा कोर्स के शेड्यूल की व्यावहारिक ज़रूरतों को प्राथमिकता दी गई।

अब सभी की निगाहें सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल में चल रहे मामले के नतीजे पर होंगी, जो तय करेगा कि 1993 की गृह मंत्रालय की मेमोरेंडम को भविष्य के बैचों के लिए संशोधित किया जाए या पूरी तरह से रद्द कर दिया जाए।

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