सुप्रीम कोर्ट ने एक नए रेफरल के जरिए व्यक्तिगत दिवाला (personal insolvency) प्रक्रिया में चेक बाउंस (cheque bounce) मामलों की स्थिति पर सवाल खड़ा कर दिया है। यह फैसला दिनेशचंद सुराना मामले से जुड़ा है और इससे उन प्रमोटरों पर असर पड़ सकता है जो कंपनी के कर्ज के लिए व्यक्तिगत गारंटर (personal guarantors) हैं। इससे समाधान प्रक्रिया में देरी और कानूनी अड़चनें आ सकती हैं।
क्या हुआ?
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम कानूनी सवाल को बड़ी बेंच को रेफर कर दिया है। यह मामला दिनेशचंद सुराना बनाम यूको बैंक (Dineshchand Surana vs. UCO Bank) का है। कोर्ट यह तय कर रहा है कि क्या इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के तहत व्यक्तिगत दिवाला (personal insolvency) की प्रक्रिया शुरू होने के बाद भी नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स (NI) एक्ट की धारा 138 के तहत चेक बाउंस के मामले जारी रह सकते हैं।
आमतौर पर, जब कोई व्यक्ति या कंपनी दिवालिया घोषित होती है, तो एक 'स्टे' (moratorium) लागू हो जाता है। यह एक कानूनी सुरक्षा कवच की तरह काम करता है, जो लेनदारों को देनदार के खिलाफ नए कानूनी एक्शन शुरू करने या जारी रखने से रोकता है। अब मुख्य सवाल यही है कि क्या यह सुरक्षा कवच धारा 138 के आपराधिक मामलों पर भी लागू होता है, या ये मामले समानांतर रूप से चलते रह सकते हैं।
कानूनी टकराव को समझना
यह रेफरल ऐसे समय में आया है जब इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी बोर्ड ऑफ इंडिया (IBBI) ने 2 जून 2026 को व्यक्तिगत गारंटी देने वालों के लिए दिवाला प्रक्रिया को और बेहतर बनाने के लिए नए संशोधन पेश किए थे। इसका मकसद एक सुपरवाइज्ड सिस्टम बनाना था जिससे संपत्ति का प्रबंधन स्पष्ट रूप से हो सके। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्टे के दायरे की फिर से जांच करने के फैसले से, एक सुचारू प्रक्रिया के बजाय संभावित समानांतर कानूनी लड़ाई की स्थिति पैदा हो गई है।
निवेशकों और स्टेकहोल्डर्स के लिए चिंता का विषय
निवेशकों के लिए, दिवाला प्रक्रिया की स्थिरता और गति महत्वपूर्ण है। संकटग्रस्त कंपनियों के प्रमोटर और डायरेक्टर अक्सर कॉरपोरेट लोन के लिए व्यक्तिगत गारंटी देते हैं। जब कंपनी वित्तीय संकट में होती है, तो बैंक अक्सर इन व्यक्तिगत गारंटियों को लागू करते हैं।
यदि धारा 138 के मामले दिवाला प्रक्रिया के स्टे से नहीं रुकते, तो प्रमोटरों और डायरेक्टर्स को एक साथ दोहरे कानूनी दबाव का सामना करना पड़ सकता है। उन्हें एक तरफ दिवालियापन समाधान प्रक्रिया से निपटना होगा, और दूसरी तरफ संभावित आपराधिक या अर्ध-आपराधिक कार्रवाई का भी सामना करना पड़ेगा। यह दोहरा बोझ प्रमोटरों का ध्यान भटका सकता है, जिससे वे कंपनी के वित्तीय सुधार या सेटलमेंट पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाएंगे, जो दिवालियापन समाधान के लिए बहुत जरूरी है।
दिवालियापन समाधान पर असर
जब कानूनी कार्यवाही विभिन्न अदालतों में बंटी होती है, तो समाधान में लगने वाला समय काफी बढ़ जाता है। वर्तमान अनिश्चितता के कारण इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल और सलाहकार अपनी रणनीति पर फिर से विचार करने को मजबूर हैं। पहले यह व्यापक रूप से समझा जाता था कि IBC का स्टे एक संपूर्ण विराम प्रदान करेगा। अब, लेनदार धारा 138 के मामलों को आगे बढ़ाने में अधिक आश्वस्त महसूस कर सकते हैं, यह तर्क देते हुए कि ये सिविल स्टे का हिस्सा नहीं हैं। इससे ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है जहां व्यक्तिगत गारंटर अंतहीन मुकदमेबाजी में उलझ जाता है, जिससे लेनदारों के लिए बड़ी वसूली प्रक्रिया अटक जाती है।
आगे क्या देखना है?
बड़ी बेंच के अंतिम फैसले आने तक व्यक्तिगत दिवाला के लिए कानूनी माहौल फिलहाल अनिश्चित है। इस प्रक्रिया में काफी समय लग सकता है। निवेशकों और हितधारकों को दो प्रमुख अपडेट पर नज़र रखनी चाहिए। पहला, क्या संसद IBC में स्पष्ट रूप से स्टे के दायरे को स्पष्ट करने और इस अनिश्चितता को समाप्त करने के लिए सक्रिय कदम उठाती है। दूसरा, इस बीच बैंक और अन्य लेनदार व्यक्तिगत गारंटर के साथ कैसे पेश आते हैं, इसमें कोई बदलाव। दिवालियापन प्रणाली इस कानूनी अस्पष्टता से कितनी जल्दी निपटती है, यह संकटग्रस्त संपत्तियों के समाधान की गति के लिए एक महत्वपूर्ण कारक होगा।
