सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को एक हत्या के मुकदमे में हो रही भारी देरी पर कड़ी फटकार लगाई है। एक आरोपी चार साल से जेल में बंद है, लेकिन मुकदमे की रफ्तार बेहद धीमी है। कोर्ट ने इस मामले में विदेशी नागरिक को जमानत देने से इनकार कर दिया, लेकिन धीमी कानूनी प्रक्रिया का औपचारिक स्पष्टीकरण मांगा है।
4 साल से लटका है ट्रायल, आरोपी जेल में
सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच, जिसमें जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस शील नागू शामिल थे, ने शुक्रवार को महाराष्ट्र सरकार की खिंचाई की। कोर्ट ने पाया कि एक आरोपी पिछले 4 साल से हिरासत में है, फिर भी मुकदमे में कोई खास प्रगति नहीं हुई है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस अवधि में अभियोजन पक्ष के 45 गवाहों में से केवल 2 गवाहों की ही गवाही हो पाई है। कोर्ट ने राज्य की कानूनी और जांच प्रक्रियाओं की दक्षता पर सवाल उठाए हैं।
विदेशी नागरिक को नहीं मिली जमानत
इस मामले में फंसे केल्विन चिंडोज़ी ओकोरो, जो एक विदेशी नागरिक हैं, उन्हें मई 2022 में गिरफ्तार किया गया था। उन पर अपहरण और हत्या जैसे गंभीर आरोप थे। बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा उनकी जमानत याचिका खारिज करने के बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि मुकदमे में अत्यधिक देरी को देखते हुए परिस्थितियों में बदलाव आया है, लेकिन कोर्ट ने फिलहाल जमानत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि राहत के लिए कोई पर्याप्त आधार नहीं मिला है।
सिस्टम की धीमी गति पर सवाल
सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने राज्य के रवैये पर भी टिप्पणी की। एक तरफ जहां सरकार जमानत याचिकाओं का कड़ा विरोध करती है, वहीं दूसरी तरफ समय पर ट्रायल पूरा करने की अपनी जिम्मेदारी निभाने में लापरवाही करती दिख रही है। जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि यह एक बड़ी समस्या बन गई है कि कानूनी कार्यवाही में प्रगति के बिना लोगों को लंबे समय तक जेल में बंद रखा जा रहा है। कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को इस मुकदमे के रुकने के पीछे के विशिष्ट कारणों का विस्तृत हलफनामा (Affidavit) दाखिल करने का निर्देश दिया है।
यह न्यायिक हस्तक्षेप कानूनी प्रणाली के भीतर प्रशासनिक और संस्थागत देरी पर सुप्रीम कोर्ट के हालिया सख्त रुख को दर्शाता है। हाल ही में, कोर्ट ने पंजाब में भी इसी तरह के मुद्दों को उठाया था, जिससे यह संकेत मिलता है कि अदालती प्रक्रियाओं में अनावश्यक और अनिश्चितकालीन देरी को रोकने पर व्यापक ध्यान दिया जा रहा है। आगे यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि महाराष्ट्र सरकार अपने हलफनामे में देरी के क्या कारण बताती है - चाहे वह प्रक्रियात्मक चूक हो, गवाहों की अनुपलब्धता हो, या संस्थागत संसाधनों की कमी।
