निष्क्रिय संपत्ति का बढ़ता बोझ
भारत में लावारिस पड़ी वित्तीय संपत्तियों का आंकड़ा चिंताजनक रूप से बढ़ता जा रहा है। विभिन्न रिपोर्ट्स के अनुसार, देश में कुल ₹1.84 लाख करोड़ से ज़्यादा की रकम निष्क्रिय पड़ी है। इनमें बैंक डिपॉजिट्स की ₹67,000 करोड़ से लेकर ₹78,000 करोड़ तक की राशि शामिल है। वहीं, इंश्योरेंस पॉलिसियों में ₹13,000 करोड़ से अधिक, म्यूचुअल फंड्स में लगभग ₹3,000 करोड़ और अनक्लेम्ड डिविडेंड (unclaimed dividends) के तौर पर ₹9,000 करोड़ से ज़्यादा की रकम फंसी हुई है। लंबी अवधि (जैसे बैंक डिपॉजिट्स के लिए 10 साल) तक क्लेम न होने पर, इन पैसों को डिपॉजिटर्स एजुकेशन एंड अवेयरनेस (DEA) फंड, इन्वेस्टर एजुकेशन एंड प्रोटेक्शन फंड (IEPF) जैसे सरकारी फंड्स में ट्रांसफर कर दिया जाता है। हालांकि, यह पैसा जनता के हित में इस्तेमाल होता है, लेकिन असली वारिसों के लिए अपनी संपत्ति वापस पाना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
सेंट्रलाइज्ड डेटाबेस की ज़रूरत
इस समस्या का मुख्य कारण एक ऐसे सिंगल, आसानी से खोजी जा सकने वाले डेटाबेस का न होना है, जहाँ सभी प्रकार की लावारिस संपत्तियों की जानकारी मिल सके। अगस्त 2023 में RBI ने UDGAM पोर्टल लॉन्च किया था, जो हिस्सा लेने वाले बैंकों के लावारिस बैंक डिपॉजिट्स की जानकारी तो देता है, लेकिन यह सभी तरह की वित्तीय संपत्तियों जैसे इंश्योरेंस, शेयर आदि को कवर नहीं करता। ऐसे में, एक व्यापक, मल्टी-एसेट डेटाबेस की सख़्त ज़रूरत है। यह तब और भी अहम हो जाता है जब सरकार ने जुलाई 2023 तक ऐसे सिस्टम बनाने की अपनी समय-सीमा पार कर दी थी।
नियामक बदलाव और अदालती चिंताएं
सरकार और RBI ने यह तर्क दिया है कि मौजूदा नो योर कस्टमर (KYC) और नॉमिनेशन (nomination) नियम इस समस्या से निपटने में मदद करते हैं। हाल ही में, RBI ने मृतक ग्राहकों के खातों से क्लेम सेटलमेंट की प्रक्रिया को आसान बनाने के निर्देश भी जारी किए हैं। नई गाइडलाइंस के तहत, 2025 के अंत से, बिना नॉमिनी वाले खातों से ₹15 लाख तक की रकम कोर्ट ऑर्डर या इंडेम्निटी बॉन्ड के बिना क्लेम की जा सकेगी।
लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने इन उपायों पर सवाल उठाए हैं। कोर्ट का मानना है कि ये प्रक्रियात्मक बदलाव वास्तव में संपत्ति की पहचान की मूल समस्या का समाधान नहीं करते। कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई है कि अगर संवेदनशील डेटा ज़्यादा लोगों के लिए उपलब्ध कराया गया तो धोखाधड़ी का ख़तरा बढ़ सकता है, और ऑनलाइन स्कैमर वारिस बनकर ठगी कर सकते हैं।
देरी पर चिंता और भविष्य की राह
लगातार हो रही देरी और सुप्रीम कोर्ट के तीखे सवालों से पता चलता है कि इस मामले में समाधान निकालने की रफ़्तार धीमी है। सरकार का डेडलाइन मिस करना और UDGAM पोर्टल जैसे सीमित उपायों से यह स्पष्ट है कि इसे पर्याप्त प्राथमिकता नहीं दी जा रही। अमेरिका और यूके जैसे देशों में अधिक एकीकृत सिस्टम हैं, जहाँ पब्लिक पोर्टल्स के साथ-साथ धोखाधड़ी रोकने के पुख्ता इंतज़ाम हैं। भारत का रवैया अभी उतना सक्रिय और एकीकृत नहीं लगता। सुप्रीम कोर्ट का धोखाधड़ी को लेकर चिंतित होना जायज़ है, लेकिन मौजूदा सिस्टम की अक्षमता के कारण वैध दावेदार भी अपनी मेहनत की कमाई से वंचित रह सकते हैं।
अब 5 मई को अगली सुनवाई होनी है। सरकार और RBI को अपने ताज़ा हलफनामों में ठोस एक्शन प्लान पेश करने होंगे। सुप्रीम कोर्ट इन योजनाओं की बारीकी से जांच करेगा और एक ऐसे सेंट्रलाइज्ड डेटाबेस के लिए समय-सीमा और मज़बूत तंत्र तय करने पर ज़ोर देगा, जो पारदर्शिता और सुरक्षा दोनों का ख्याल रखे। इस फैसले से भारत में लावारिस वित्तीय संपत्तियों के प्रबंधन का तरीका बदल सकता है, जिससे सही मालिकों को उनका हक मिल सकेगा और वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र की अखंडता बढ़ेगी।
