सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब नेशनल बैंक (PNB) को बड़ा झटका देते हुए आदेश दिया है कि बैंक को नई दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित अपने लीज पर लिए गएर्शियल स्पेस को 31 जनवरी 2027 तक खाली करना होगा। कोर्ट ने साफ किया है कि बैंकों के मर्जर (Amalgamation) से जुड़े सरकारी नियम, मकान मालिक के प्रॉपर्टी सबलेटिंग (Subletting) या ट्रांसफर को रोकने के कानूनी अधिकार पर हावी नहीं होंगे। यह फैसला 1986 के एक बैंक मर्जर से जुड़े पुराने विवाद को सुलझाता है।
क्या है पूरा मामला?
सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने प्रॉपर्टी राइट्स और बैंक मर्जर को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने पंजाब नेशनल बैंक (PNB) को नई दिल्ली के कनॉट सर्कस स्थित प्रताप बिल्डिंग में अपनेर्शियल प्रॉपर्टी को खाली करने का आदेश दिया है। दशकों से इस जगह पर काबिज बैंक को अब मकान मालिक, ब्रिटिश मोटर कार कंपनी लिमिटेड के साथ लंबे कानूनी विवाद के बाद, यह जगह छोड़नी पड़ेगी।
यह विवाद 1947 का है जब प्रॉपर्टी मूल रूप से हिंदुस्तान कमर्शियल बैंक को लीज पर दी गई थी। 1986 में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की मंजूरी के बाद जब हिंदुस्तान कमर्शियल बैंक का PNB में मर्जर हुआ, तो प्रॉपर्टी की जिम्मेदारी पब्लिक सेक्टर के इस बैंक पर आ गई। इसके बाद मकान मालिक ने इस आधार पर बेदखली की अर्जी दी कि PNB को यह लीज बिना उनकी लिखित सहमति के ट्रांसफर की गई थी।
मकान मालिक के अधिकारों को मिली प्राथमिकता
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय कारोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच के सामने मुख्य मुद्दा यह था कि क्या सरकारी बैंकों के मर्जर के नियम, स्थानीय रेंट कंट्रोल (Rent Control) कानूनों के तहत मकान मालिक के अधिकारों को ओवरराइड कर सकते हैं। PNB का तर्क था कि उनका कब्जा बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट (Banking Regulation Act) के तहत एक स्टेट्यूटरी एडमिनिस्ट्रेटिव स्कीम (Statutory Administrative Scheme) का नतीजा है और इसे दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट, 1958 पर प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। बेंच ने साफ किया कि एडमिनिस्ट्रेटिव स्कीम्स, मकान मालिकों के मौलिक अधिकारों को दरकिनार करने की अथॉरिटी नहीं रखतीं। फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट की धारा 14(1)(b) पूर्ण रूप से लागू रहती है। कोर्ट के अनुसार, यदि मूल किराएदार की पहचान बदल जाती है और नया एंटिटी (Entity) मकान मालिक की स्पष्ट सहमति के बिना जगह पर कब्जा कर लेता है, तो यह बेदखली का कानूनी आधार बनता है, चाहे कब्जे का बदलाव स्वैच्छिक हो या स्टेट्यूटरी।
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने जहां मकान मालिक के पक्ष में फैसला सुनाया और दिल्ली हाई कोर्ट के पिछले ऑर्डर्स को सेट असाइड (Set Aside) कर दिया, वहीं PNB को व्यवस्थित ढंग से बाहर निकलने के लिए 31 जनवरी 2027 तक का समय दिया है। यह अतिरिक्त समय बैंक को ऑपरेशनल डिस्टरबेंस (Operational Disturbance) कम करने में मदद करेगा। बैंक को कोर्ट में एक अंडरटेकिंग (Undertaking) देनी होगी और प्रॉपर्टी खाली होने तक अपने किराए का भुगतान जारी रखना होगा।
निवेशकों के लिए, बैंक की इस ऑफिस को कहीं और शिफ्ट करने की योजना पर नजर रखना अहम होगा, क्योंकि कनॉट प्लेस राष्ट्रीय राजधानी का एक हाई-वैल्यूर्शियल हब है। हालांकि, इस एक ब्रांच के लोकेशन के जाने से PNB की कुल वित्तीय सेहत पर कोई बड़ा असर पड़ने की उम्मीद नहीं है, लेकिन यह पुराने बैंक मर्जर से मिले एसेट्स (Assets) को मैनेज करने की जटिलताओं की याद दिलाता है। बैंक को अब जनवरी 2027 की डेडलाइन से पहले नई दिल्ली इलाके में एक नयार्शियल स्पेस सुरक्षित करने की ट्रांजिशन (Transition) और संबंधित लागतों का प्रबंधन करना होगा।
