Supreme Court का बड़ा फैसला: AI के Fake कानूनों पर Bar Council बनाएगी गाइडलाइंस

LAWCOURT
Whalesbook Logo
AuthorAditi Chauhan|Published at:
Supreme Court का बड़ा फैसला: AI के Fake कानूनों पर Bar Council बनाएगी गाइडलाइंस

सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (Bar Council of India) को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस्तेमाल के लिए गाइडलाइंस बनाने का आदेश दिया है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब कोर्ट ने AI द्वारा बनाए गए मनगढ़ंत कानूनी मिसालों पर आधारित ट्रिब्यूनल के फैसलों को खारिज कर दिया है।

AI के Fake कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को कानूनी पेशेवरों द्वारा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस्तेमाल को लेकर एक औपचारिक गाइडलाइन बनाने का निर्देश दिया है। यह आदेश तब आया है जब शीर्ष अदालत ने पाया कि नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) और नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) की कुछ इन्सॉल्वेंसी (दिवालियापन) कार्यवाही में AI द्वारा बनाए गए ऐसे केस लॉज़ का इस्तेमाल किया गया था जो मौजूद ही नहीं थे। कोर्ट ने ऐसे मनगढ़ंत कानूनी मिसालों का हवाला देने के प्रति 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाई है।

AI के दौर में वकीलों की ज़िम्मेदारी

हालांकि कोर्ट ने इन AI-जनित झूठे कानूनों को पेशेवर कदाचार (professional misconduct) करार दिया, लेकिन इस बार अवमानना (contempt) की कार्यवाही शुरू नहीं की गई। इसके बजाय, निचली अदालतों द्वारा इन मनगढ़ंत फैसलों पर निर्भरता को एक चूक माना गया। यह फैसला भारतीय कानूनी व्यवस्था में जनरेटिव AI के लिए एक औपचारिक नियामक ढांचे की कमी को उजागर करता है। BCI को यह जिम्मेदारी सौंपकर, कोर्ट तेजी से बढ़ती तकनीक और कानूनी पेशेवरों के व्यावसायिक दायित्वों के बीच की खाई को पाटने की कोशिश कर रहा है।

वैश्विक मानक और वेरिफिकेशन का जोखिम

यह कदम दुनिया के अन्य प्रमुख देशों में हो रहे नियामक बदलावों के अनुरूप है, जहाँ AI-जनित सामग्री के जोखिमों को पहले ही संबोधित किया जा चुका है। यूनाइटेड किंगडम में, अदालतों ने चेतावनी दी है कि ChatGPT जैसे टूल पारंपरिक कानूनी अनुसंधान के विश्वसनीय विकल्प नहीं हैं और AI से उत्पन्न सभी आउटपुट को स्वतंत्र रूप से सत्यापित (verified) किया जाना चाहिए। इसी तरह, संयुक्त राज्य अमेरिका में भी ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें वकीलों को AI टूल द्वारा बनाए गए नकली केस लॉ का हवाला देने पर वित्तीय दंड का सामना करना पड़ा है। ये अंतर्राष्ट्रीय मामले एक सामान्य सिद्धांत को रेखांकित करते हैं: सटीकता और प्रामाणिकता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी पूरी तरह से मानव कानूनी प्रतिनिधि की होती है, न कि सॉफ्टवेयर की।

कानूनी प्रक्रियाओं पर असर

भारतीय कानूनी प्रणाली और इसके प्रतिभागियों के लिए, अब जोर कठोर सत्यापन (rigorous verification) पर शिफ्ट हो रहा है। मौजूदा कानून पहले से ही अदालत में जानबूझकर झूठी सामग्री पेश करने पर झूठी गवाही या अवमानना ​​जैसे सख्त दंड का प्रावधान करते हैं। बार काउंसिल से आने वाली आगामी गाइडलाइंस इन दायित्वों को औपचारिक रूप देने की उम्मीद है। कॉर्पोरेट मुकदमेबाजी या इन्सॉल्वेंसी प्रक्रियाओं में शामिल निवेशकों और बाजार सहभागियों को यह ध्यान रखना चाहिए कि सटीकता पर यह जोर भविष्य की ट्रिब्यूनल सुनवाई में साक्ष्य और केस अनुसंधान कैसे प्रस्तुत किया जाता है, इसे प्रभावित कर सकता है। उद्योग के लिए मुख्य निगरानी योग्य पहलू इन नियमों का अंतिम रूप से तैयार होना होगा, जो यह तय करेगा कि न्यायिक परिणामों की अखंडता से समझौता किए बिना प्रौद्योगिकी को पेशेवर कानूनी कार्य में सुरक्षित रूप से कैसे एकीकृत किया जा सकता है।

Disclaimer:This article is published for informational purposes only. While reasonable efforts are made to ensure accuracy, completeness, and timeliness, readers are encouraged to independently verify information before making any decisions based on the content. The views and information presented are subject to editorial review and may be updated without notice.