भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि सुरक्षित और चिह्नित फुटपाथों पर चलना संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार है। इस फैसले के अनुसार, सरकारी प्राधिकरणों को अब मोटर चालित परिवहन पर पैदल यात्री बुनियादी ढांचे को प्राथमिकता देने के लिए एक बाध्यकारी ढांचा बनाना होगा।
अब 'चलने का अधिकार' भी फंडामेंटल राइट
सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि सुरक्षित और चिह्नित फुटपाथों पर चलना संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार है। 19 जून 2026 को जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर की बेंच ने यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने साफ किया कि आर्टिकल 19(1)(d) के तहत मिलने वाली आवागमन की स्वतंत्रता सिर्फ गाड़ी चलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें पैदल चलना भी शामिल है।
इंफ्रास्ट्रक्चर और जवाबदेही पर असर
इस फैसले से सरकारी एजेंसियों और स्थानीय प्राधिकरणों पर अब यह कानूनी जिम्मेदारी आ गई है कि वे जहां भी सड़कें हैं, वहां पर्याप्त फुटपाथ बनाएं और उनका रखरखाव करें। कोर्ट ने इस मामले में एक नई प्रोसीडिंग शुरू की है, जिसका नाम 'Re: Fundamental Right to Walk and Footpath' है। साथ ही, आवास और शहरी मामलों, ग्रामीण विकास और सड़क परिवहन जैसे मंत्रालयों को एक विस्तृत वैधानिक ढांचा तैयार करने का निर्देश दिया है। लॉ कमीशन ऑफ इंडिया भी इस पर काम कर रहा है। इसका मतलब है कि भविष्य में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में पैदल चलने वालों की सुरक्षा और पैदल चलने की सुविधा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकेगा।
सड़क सुरक्षा और प्रशासनिक कमी
यह फैसला देश में सड़क सुरक्षा की गंभीर स्थिति को देखते हुए लिया गया है। 2024 के आंकड़ों के अनुसार, सड़क हादसों में 36,526 पैदल चलने वालों की मौत हुई, जो कुल सड़क मौतों का 20% से ज्यादा है। विशेषज्ञों का कहना है कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 जैसे मौजूदा कानूनों में हमेशा गाड़ियों की रफ्तार को प्राथमिकता दी गई है, जबकि पैदल चलने वालों के लिए सुविधाओं को अक्सर अनदेखा किया गया है। इंडियन रोड्स कांग्रेस (IRC) की गाइडलाइंस के अनुसार कम से कम 1.8 मीटर चौड़े फुटपाथ होने चाहिए, लेकिन स्थानीय निकाय अक्सर इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं।
भविष्य में क्या होगा?
अब सलाहकारी इंजीनियरिंग नियमों की जगह कानूनी आदेशों का पालन करना होगा। इससे शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के बजट और अमल में बड़े बदलाव आने की उम्मीद है। अर्बन प्लानर्स का मानना है कि नए इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की मंजूरी के लिए 'वॉकबिलिटी ऑडिट' अनिवार्य हो सकता है और सड़क निवेश बजट का एक हिस्सा गैर-मोटर चालित परिवहन के लिए भी तय किया जा सकता है। चेन्नई की नॉन-मोटराइज्ड ट्रांसपोर्ट पॉलिसी और पिंपरी-चिंचवाड़ के ग्रीन म्युनिसिपल बॉन्ड जैसे कदम भविष्य के लिए मॉडल बन सकते हैं। निवेशकों को आने वाले समय में सरकारी नियमों में बदलाव और शहरी निकायों द्वारा किए जाने वाले बजट आवंटन पर नजर रखनी चाहिए।
