बेनामी संपत्ति पर NCLT का अधिकार खत्म
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि NCLT और NCLAT, बेनामी प्रॉपर्टी ट्रांज़ैक्शन्स एक्ट, 1988 के तहत अटैच की गई संपत्तियों की वैधता को चुनौती नहीं दे सकते। कोर्ट ने लिक्विडेटर्स की उन अपीलों को खारिज कर दिया, जिनमें उन्होंने IBC ट्रिब्यूनल में बेनामी एक्ट के तहत अटैचमेंट को चुनौती देने की कोशिश की थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि IBC का मकसद केवल कॉर्पोरेट डेटर की अपनी जायदाद को बांटना है, न कि उन संपत्तियों को, जिन पर बेनामी होने का संदेह है।
सरकारी कार्रवाई को IBC पर प्राथमिकता
कोर्ट ने साफ किया कि बेनामी एक्ट के तहत की गई कार्रवाई एक 'संप्रभु कार्रवाई' (sovereign action) है और यह IBC के तहत चलने वाली इंसॉल्वेंसी प्रोसीडिंग्स पर हावी रहेगी। इसका मतलब है कि अगर किसी संपत्ति को बेनामी माना गया है, तो उसे इंसॉल्वेंसी या लिक्विडेशन के दौरान नहीं बचाया जा सकता। कोर्ट ने यह भी माना कि NCLT को इन संप्रभु कार्रवाइयों की समीक्षा करने की अनुमति देना उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
'एम्बेसी प्रॉपर्टी' केस का हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में 'एम्बेसी प्रॉपर्टी डेवलपमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम स्टेट ऑफ कर्नाटक' केस के पुराने फैसले का भी हवाला दिया। उस केस में भी कोर्ट ने NCLT के अधिकार क्षेत्र को सार्वजनिक कानून या संप्रभु कार्रवाई में दखल देने से रोकने की चेतावनी दी थी। इस नए फैसले से यह बात और पुख्ता हो गई है कि IBC, बेनामी एक्ट जैसे विशेष कानूनों के तहत सरकारी निकायों द्वारा की गई कार्रवाइयों पर न्यायिक समीक्षा का अधिकार नहीं देता। बेनामी एक्ट अपने आप में एक पूर्ण कोड है, जिसका अपना अलग न्यायिक ढांचा है।
कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग और जुर्माने का प्रावधान
सुप्रीम कोर्ट ने उन लिक्विडेटर्स की तीखी आलोचना की जिन्होंने IBC ट्रिब्यूनल में बेनामी एक्ट के तहत की गई अटैचमेंट को चुनौती देकर "कानूनी प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग" किया। कोर्ट ने ऐसे मामलों में ₹5 लाख का भारी जुर्माना भी लगाया। यह फैसला भविष्य में इस तरह की कोशिशों को रोकने के लिए एक सख्त संदेश है।
लेनदारों की रिकवरी पर असर
इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह लेनदारों (creditors) की संपत्ति रिकवर करने की संभावनाओं को जटिल बना सकता है। अगर बेनामी एक्ट के तहत कोई संपत्ति अटैच हो जाती है, तो वह IBC के तहत लिक्विडेशन की संपत्ति से बाहर हो जाएगी, भले ही वह कंपनी की इकलौती बड़ी संपत्ति हो। इससे लेनदारों को उनकी देनदारियों की रिकवरी में और दिक्कत आ सकती है। ऐसे संकेत हैं कि भारतीय इंसॉल्वेंसी मामलों में रिकवरी रेट पहले से ही कम है, जो Q3 FY26 में घटकर करीब 20% रह गया था। कोर्ट ने साफ किया कि IBC, देनदार की जायदाद से संबंधित है, न कि तीसरे पक्ष की ओर से रखे गए या ट्रस्ट वाली संपत्तियों से।
आगे का रास्ता
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से भविष्य में होने वाली कानूनी चुनौतियों में स्पष्टता आने की उम्मीद है। यह तय हो गया है कि संप्रभु कार्रवाई से जुड़े विशेष कानूनों को इंसॉल्वेंसी जैसे सामान्य कानूनों पर प्राथमिकता मिलेगी। हालांकि, बेनामी अटैचमेंट वाले मामलों में संपत्ति की रिकवरी की गति और मात्रा पर क्या असर पड़ेगा, यह देखना बाकी होगा। वित्तीय संस्थानों और लेनदारों के लिए यह ज़रूरी होगा कि वे इंसॉल्वेंसी प्रोसीडिंग्स में पूरी 'ड्यू डिलिजेंस' (due diligence) करें ताकि बेनामी एक्ट के तहत किसी भी पूर्व दावे या अटैचमेंट की पहचान हो सके।