सुप्रीम कोर्ट ने JD(S) नेता HD Revanna को यौन उत्पीड़न मामले में बरी करने के खिलाफ कर्नाटक सरकार की अपील पर नोटिस जारी किया है। निचली अदालत ने शिकायत दर्ज करने में चार साल की देरी का हवाला देते हुए उन्हें पहले बरी कर दिया था। अब शीर्ष अदालत न्यायिक प्रक्रिया और बरी करने के कानूनी आधार की समीक्षा कर रही है।
SC ने निचली अदालत के फैसले की समीक्षा शुरू की
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने जनता दल (सेक्युलर) के नेता HD Revanna को यौन उत्पीड़न मामले में बरी करने के निचली अदालत के फैसले की समीक्षा शुरू कर दी है। जस्टिस JB Pardiwala और K Vinod Chandran की पीठ ने कर्नाटक सरकार की अपील पर नोटिस जारी किया है। सरकार बेंगलुरु की एक ट्रायल कोर्ट द्वारा दिसंबर 2025 में Revanna को दी गई राहत की वैधता को चुनौती देना चाहती है।
देरी के कारण हुआ था बरी?
ट्रायल कोर्ट ने Revanna को बरी करने का फैसला मुख्य रूप से शिकायत दर्ज करने में चार साल की देरी के आधार पर दिया था। यह फैसला नवंबर 2025 में कर्नाटक हाई कोर्ट के उस आदेश के बाद आया था, जिसने विभिन्न आपराधिक आरोपों के बीच अंतर करते हुए आंशिक राहत दी थी। हाई कोर्ट ने मामले को वापस भेज दिया था, जिसके बाद ट्रायल कोर्ट ने आरोप हटा दिए थे।
SC ने उठाए सवाल
हाल की सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले की न्यायिक xử lý पर चिंता जताई। कोर्ट ने विशेष रूप से हाई कोर्ट के आरोपों को बदलने के फैसले पर सवाल उठाया और इस बात पर संदेह जताया कि क्या भारतीय दंड संहिता की धारा 354 (महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने से संबंधित) के तहत बरी करना, आरोपों की प्रकृति को देखते हुए कानूनी रूप से उचित था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला अप्रैल 2025 में दर्ज की गई एक FIR से उत्पन्न हुआ था, जिसमें HD Revanna और उनके बेटे Prajwal Revanna पर यौन उत्पीड़न और पीछा करने के आरोप शामिल थे। ये आरोप कथित हमलों को दर्शाने वाले वीडियो के सार्वजनिक होने के बाद सामने आए थे। हालांकि HD Revanna को यौन उत्पीड़न और अपहरण से संबंधित दो अलग-अलग आपराधिक मामलों में जमानत मिल चुकी है, राज्य सरकार उत्पीड़न के आरोपों को फिर से बहाल करने के लिए कानूनी प्रयास जारी रखे हुए है।
कानूनी परिदृश्य पर नजर रखने वालों के लिए, मुख्य ध्यान सुप्रीम कोर्ट द्वारा ऐसे शिकायतों को दर्ज करने की समय सीमा की व्याख्या और निचली अदालतों में प्रक्रियात्मक स्थिरता पर रहेगा। इस अपील का परिणाम इस बात पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है कि ट्रायल कोर्ट उन मामलों को कैसे संभालते हैं जहां कथित घटना और पुलिस शिकायत दर्ज होने के बीच काफी समय का अंतर होता है।
