न्यायिक क्षमता का विस्तार, पर सवालों के घेरे में प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट में पांच नए न्यायाधीशों की नियुक्ति को संस्थागत क्षमता बढ़ाने के एक कदम के तौर पर देखा जा रहा है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट में जजों की कुल संख्या 37 हो गई है, जबकि कुल स्वीकृत क्षमता 38 है। लेकिन, यह नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब कोर्ट में रिकॉर्ड संख्या में केस लंबित हैं और जजों की नियुक्ति की कोलेजियम प्रणाली (Collegium System) की दक्षता पर भी लगातार सवाल उठ रहे हैं।
बार से सीधे नियुक्ति का अनोखा कदम
इस बार सीनियर एडवोकेट वी. मोहन (V. Mohana) को सीधे बार से नियुक्त किया गया है, जो कि हाई कोर्ट से होने वाली पारंपरिक नियुक्तियों से अलग है। इन नियुक्तियों का मुख्य उद्देश्य बढ़ते केस लोड को संभालना है। ऐसा लगता है कि इस बार खास विशेषज्ञता वाले जजों को नियुक्त करने पर जोर दिया गया है। पर्यावरण कानून, निजता के अधिकार जैसे मामलों में विशेषज्ञता के साथ-साथ प्रशासनिक अनुभव रखने वाले इन जजों से कोर्ट को काफी उम्मीदें हैं। हालांकि, बार से सीधे नियुक्ति की प्रक्रिया कोलेजियम की पारदर्शिता पर बहस छेड़ सकती है।
क्या संख्या बढ़ाना ही काफी है?
विशेषज्ञों का मानना है कि जजों की संख्या बढ़ाना एक गहरी संरचनात्मक समस्या का सतही समाधान है। चिंता केवल जजों की संख्या की नहीं, बल्कि उन प्रक्रियात्मक खामियों की है जिनके कारण केसों के निपटारे में देरी हो रही है। आलोचकों का कहना है कि सिर्फ सीटें भरने से काम नहीं चलेगा, जब तक कि डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और केस मैनेजमेंट सिस्टम को आधुनिक नहीं बनाया जाता। ऐसे में, जजों की संख्या 34 हो या 38, अगर निचली अदालतों के इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार नहीं हुआ, तो सुप्रीम कोर्ट कानूनी व्यवस्था के लिए एक बाधा बना रहेगा।
आगे की राह और कार्यकाल
नए नियुक्त जजों का कार्यकाल तीन से पांच साल तक का है। यह समय इन जजों के लिए लंबित केसों की श्रेणियों को निपटाने का एक अवसर प्रदान करता है, बशर्ते प्रक्रियात्मक बाधाओं को दूर किया जाए। हालांकि, जजों का कोर्ट के आउटपुट पर कितना प्रभाव पड़ेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वे संस्थागत दक्षता को कितना महत्व देते हैं। विश्लेषक सतर्क हैं, क्योंकि ऐतिहासिक रूप से यह देखा गया है कि जजों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ केसों की फाइलिंग भी बढ़ती है, जिससे उत्पादकता में हुई वृद्धि बेअसर हो जाती है।
