छात्र की आत्महत्या का मामला: सुप्रीम कोर्ट ने प्रोफेसर की अग्रिम जमानत याचिका खारिज की

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
छात्र की आत्महत्या का मामला: सुप्रीम कोर्ट ने प्रोफेसर की अग्रिम जमानत याचिका खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कन्नूर डेंटल कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. एम. कोडांडा राम की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। यह याचिका एक दलित छात्र की आत्महत्या के संबंध में दायर की गई थी। कोर्ट ने प्रोफेसर के कथित दुर्व्यवहार को 'अमानवीय' करार दिया और कहा कि ऐसे गंभीर आचरण के परिणाम भुगतने होंगे। इससे पहले केरल हाई कोर्ट ने भी याचिका खारिज कर दी थी।

प्रोफेसर के दुर्व्यवहार पर कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने केरल के कन्नूर डेंटल कॉलेज के एक प्रोफेसर, डॉ. एम. कोडांडा राम की अग्रिम जमानत की अर्जी को ठुकरा दिया है। प्रोफेसर पर 10 अप्रैल को आत्महत्या करने वाले छात्र नितिन राज को कथित तौर पर मौखिक रूप से प्रताड़ित करने का आरोप है। इस मामले में उन पर आत्महत्या के लिए उकसाने और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के प्रावधानों के तहत आरोप लगाए गए हैं।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने मामले की सुनवाई की। इस दौरान, कोर्ट ने प्रोफेसर के कथित व्यवहार को "अमानवीय" बताया। जजों ने इस बात पर जोर दिया कि शिक्षकों की जिम्मेदारी बहुत बड़ी होती है और इस तरह के कथित आचरण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि छात्रों के साथ व्यवहार के संबंध में एक स्पष्ट संदेश जाना चाहिए। इसी के चलते, सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाई कोर्ट के पिछले फैसले में हस्तक्षेप न करने का फैसला किया।

कानूनी कार्यवाही और दलीलें

डॉ. राम ने पहले निचली अदालतों से राहत पाने की कोशिश की थी। जहां कॉलेज की एक अन्य फैकल्टी सदस्य, डॉ. संगीता नंबियार को 25 अप्रैल को अग्रिम जमानत मिल गई थी, वहीं डॉ. राम के अनुरोध को पहले सत्र न्यायालय और फिर 19 जून को हाई कोर्ट ने भी खारिज कर दिया था। डॉ. राम का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ वकील दामा सेशाद्री नायडू ने दलील दी कि छात्र की मौत कथित घटना के एक महीने बाद हुई थी। बचाव पक्ष ने यह भी संकेत दिया कि छात्र ने एक लोन एप्लीकेशन से उत्पीड़न जैसी अन्य वजहों से भी ऐसा कदम उठाया हो सकता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने माना कि कथित अपमान छात्र के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता था, जिसके चलते उन्होंने याचिका खारिज कर दी।

यह मामला शैक्षणिक संस्थानों के भीतर प्रशासनिक जवाबदेही पर बढ़ते सामाजिक और नियामक दबाव को रेखांकित करता है। मामले के अगले चरण में, आरोपी स्टाफ सदस्यों के खिलाफ आरोपों की सत्यता का निर्धारण करने के लिए निचली अदालतों में आगे की जांच और संभावित मुकदमे की कार्यवाही होगी।

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