सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: Levitate vs Stanchart केस में देरी पर दिल्ली हाई कोर्ट को फटकार

LAWCOURT
Whalesbook Logo
AuthorKaran Malhotra|Published at:
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: Levitate vs Stanchart केस में देरी पर दिल्ली हाई कोर्ट को फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट को Levitate Mobile Technologies और Standard Chartered Bank के बीच चल रहे एक पुराने कमर्शियल मुकदमे में हो रही देरी पर कड़ी फटकार लगाई है। **2015** में दायर यह केस **₹4.46 करोड़** के एक प्रोफेशनल सर्विसेज एग्रीमेंट पर विवाद से जुड़ा है। कोर्ट ने वादी (Plaintiff) की नए दस्तावेज पेश करने की अर्जी भी खारिज कर दी, और कमर्शियल मामलों में समय पर फैसले की जरूरत पर जोर दिया।

देरी पर सुप्रीम कोर्ट की सख्तNarazgi

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट में एक दशक से ज़्यादा समय से अटके कमर्शियल मुकदमे की धीमी गति पर गहरी नाराज़गी जताई है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने इस देरी को 'कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट' के मूल उद्देश्य के खिलाफ बताया, जिसका मकसद व्यापारिक विवादों का तेज़ी से निपटारा करना है।

दस्तावेज़ पेश करने की अर्जी खारिज

सुप्रीम कोर्ट का यह रुख Levitate Mobile Technologies Private Limited की उस अर्जी के बाद आया, जिसमें कंपनी Standard Chartered Bank के खिलाफ चल रहे केस में अतिरिक्त सबूत पेश करना चाहती थी। कंपनी ने वेंडर एग्रीमेंट्स और सर्वर डेटा जैसे कई दस्तावेज़ पेश करने की इजाज़त मांगी थी। साथ ही, केस दायर होने के लगभग 10 साल बाद एक गवाह को फिर से बुलाने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसने इस अर्जी को ठुकरा दिया था। दोनों अदालतों का मानना था कि वादी ने देरी के लिए कोई उचित कारण नहीं बताया और दस्तावेज़ों को टुकड़ों में पेश करना कानूनी प्रक्रिया के खिलाफ है।

मोबाइल ऐप कॉन्ट्रैक्ट पर विवाद

यह कानूनी लड़ाई फरवरी 2013 में हुए एक प्रोफेशनल सर्विसेज एग्रीमेंट से शुरू हुई, जिसके तहत Standard Chartered Bank ने Levitate Mobile Technologies को एक मोबाइल एप्लीकेशन डेवलप करने का काम सौंपा था। लेकिन, बैंक द्वारा एप्लीकेशन को हटाने की मांग के बाद तनाव पैदा हो गया। इसके चलते Levitate ने 2015 में ₹4.46 करोड़ के नुकसान का दावा करते हुए सिविल केस दायर किया। हालांकि, 'कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट' लागू होने के बाद 2018 में केस को कमर्शियल सूट के रूप में री-क्लासिफाई किया गया, लेकिन वादी की ओर से सबूत पेश करने की प्रक्रिया अभी भी अधूरी है।

कमर्शियल सूट के लिए लीगल मिसाल

सुप्रीम कोर्ट ने 'कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट' के लागू होने पर भी स्थिति स्पष्ट की। कोर्ट ने पुष्टि की कि यह कानून उन लंबित मुकदमों पर भी लागू होता है जो कमर्शियल कोर्ट्स में ट्रांसफर किए गए थे। इससे यह सुनिश्चित होता है कि पुराने मामलों में भी एक्ट की तेज़ी और कुशलता का पालन किया जाए। अपील को खारिज करके, सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट को निर्देश दिया है कि वह मुकदमे की सुनवाई को प्राथमिकता दे और जल्द से जल्द अंतिम फैसला सुनाए। यह फैसला इस बात को पुष्ट करता है कि भारी मात्रा में सबूतों को न्याय में देरी करने का बहाना नहीं बनाया जा सकता, खासकर व्यापारिक मामलों में।

निवेशकों और कानूनी जानकारों के लिए, यह मामला लंबे समय से चल रहे मुकदमों से जुड़े प्रक्रियात्मक जोखिमों की याद दिलाता है। अब आगे यह देखना होगा कि दिल्ली हाई कोर्ट बाकी बचे सबूतों पर कितनी तेज़ी से काम करता है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख से यह साफ है कि इस पुराने मामले को जल्द से जल्द निपटाने का दबाव है।

Disclaimer:This article is published for informational purposes only. While reasonable efforts are made to ensure accuracy, completeness, and timeliness, readers are encouraged to independently verify information before making any decisions based on the content. The views and information presented are subject to editorial review and may be updated without notice.