सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि जघन्य अपराधों के लिए 'आजीवन कारावास' यानी प्राकृतिक मृत्यु तक जेल की सज़ा संवैधानिक है। कोर्ट ने कहा कि अगर निचली अदालत ने सज़ा में 'छूट' (Remission) की संभावना को साफ तौर पर मना किया है, तो कैदी समय से पहले रिहाई का दावा नहीं कर सकते।
आजीवन कारावास की सज़ा का कानूनी आधार
सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी दोषी को उसकी 'प्राकृतिक मृत्यु' तक जेल में रखने की सज़ा पूरी तरह से कानूनी और संवैधानिक है। यह फैसला जघन्य अपराधों के मामलों में लागू होगा, खासकर तब जब मौत की सज़ा नहीं सुनाई जाती। कोर्ट ने 2016 के Union of India vs. V. Sriharan मामले के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि इस तरह की सज़ाओं की वैधता पर कानूनी सवाल पहले ही तय हो चुके हैं। कोर्ट ने ऐसे नए याचिकाओं को 'न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग' बताया है।
छूट (Remission) और रिहाई पर असर
इस फैसले का एक अहम हिस्सा यह है कि कैदियों को समय से पहले रिहाई का अधिकार कब नहीं होगा। कोर्ट ने साफ किया है कि अगर निचली अदालत ने सज़ा सुनाते समय स्पष्ट रूप से यह निर्देश दिया है कि सज़ा में कोई 'छूट' (Remission) नहीं मिलेगी, तो दोषी समय से पहले रिहाई का दावा नहीं कर सकता। ऐसे मामलों में, सज़ा पूरी तरह से, यानी दोषी की मृत्यु तक काटी जानी चाहिए।
हालांकि, कोर्ट ने उन मामलों में अंतर बनाए रखा है जहां मूल सज़ा के आदेश में छूट को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित नहीं किया गया है। ऐसे मामलों में, राज्य सरकार के पास Code of Criminal Procedure के Section 432 के तहत कैदी की सज़ा कम करने या छूट देने की प्रक्रिया का मूल्यांकन करने का अधिकार बना रहेगा, बशर्ते यह स्थापित कानूनी दिशानिर्देशों के अनुसार हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह फैसला राष्ट्रपति के Article 72 या राज्यपाल के Article 161 के तहत क्षमादान या सज़ा कम करने की संवैधानिक शक्तियों को प्रभावित नहीं करता है।
