सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: कोर्ट की वीडियो क्लिप्स से कमाई पर लगी रोक!

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AuthorNeha Patil|Published at:
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: कोर्ट की वीडियो क्लिप्स से कमाई पर लगी रोक!

सुप्रीम कोर्ट ने अदालती कार्यवाही की रिकॉर्डिंग को बिना इजाज़त एडिट करने और सोशल मीडिया पर पैसे कमाने पर पूरी तरह से रोक लगा दी है। इस अंतरिम आदेश के तहत, कोर्ट की कार्यवाही के इस्तेमाल के लिए पहले संबंधित अधिकारियों से अनुमति लेना ज़रूरी होगा। हालांकि, वैध न्यूज़ रिपोर्टिंग को इससे छूट दी गई है। यह फैसला AI से छेड़छाड़ और लाइव-स्ट्रीम की गई कार्यवाही के व्यावसायिक दुरुपयोग को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच आया है।

Detailed Coverage

न्याय की गरिमा बचाने की पहल

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने शुक्रवार, 24 जुलाई 2026 को, न्यायिक कार्यवाही से संबंधित ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग के इस्तेमाल को लेकर सख्त पाबंदियां लगा दी हैं। नए आदेश के अनुसार, किसी भी व्यक्ति या संस्था को सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल या संबंधित हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से पूर्व अनुमति प्राप्त किए बिना, अदालती सत्रों की क्लिप्स को सोशल मीडिया या किसी भी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निकालने, संपादित करने, प्रसारित करने या उनसे कमाई करने की इजाज़त नहीं होगी।

कोर्ट की कार्यवाही मनोरंजन नहीं

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहन भी शामिल थे, ने एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। याचिका में कहा गया था कि अदालती कार्यवाही की लाइव-स्ट्रीमिंग से पारदर्शिता तो बढ़ी है, लेकिन अब इसके छोटे-छोटे संपादित अंश (snippets) भी सर्कुलेट हो रहे हैं। इन एडिट की गई क्लिप्स का इस्तेमाल अक्सर सोशल मीडिया अकाउंट्स द्वारा कमाई के लिए किया जा रहा है, जिसे कोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा को कमज़ोर करने वाला बताया है। पीठ ने इस बात पर ज़ोर दिया कि कोर्ट की कार्यवाही को व्यावसायिक मुनाफे के लिए मनोरंजन का ज़रिया नहीं बनाया जा सकता।

AI का खतरा और रेगुलेशन की ज़रूरत

कोर्ट ने एडवांस्ड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) टूल्स से जुड़े बढ़ते जोखिमों पर भी चिंता जताई, जिनसे वीडियो कंटेंट को आसानी से जोड़-तोड़ कर भ्रामक नैरेटिव बनाए जा सकते हैं। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि ऐसी टेक्नोलॉजी की मदद से गलत मंशा वाले लोग कोर्टरूम की बातों को आसानी से तोड़-मरोड़ कर पेश कर सकते हैं। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि अगर इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स को रेगुलेटरी सुरक्षा के बिना सर्कुलेट करने की अनुमति दी गई, तो वे न्याय प्रशासन के लिए खतरा बन सकते हैं। इस समस्या से निपटने के लिए, कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह डिजिटल इंटरमीडियरीज के लिए एक औपचारिक रेगुलेटरी फ्रेमवर्क स्थापित करने हेतु ज़िम्मेदार मंत्रालयों की पहचान करे।

लाइव-स्ट्रीमिंग पर असर

यह फैसला इस बात में एक बड़ा बदलाव लाता है कि आम जनता कोर्ट के डेटा के साथ कैसे इंटरैक्ट करती है। सितंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा संविधान पीठ की कार्यवाही की लाइव-स्ट्रीमिंग शुरू करने के बाद से, इस पहल को आर्टिकल 21 के तहत न्याय तक पहुंचने के अधिकार को पूरा करने की दिशा में एक अहम कदम माना गया था। हालांकि नया प्रतिबंध आम जनता, डिजिटल क्रिएटर्स और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लागू होता है, कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इससे वैध समाचार संगठनों को इन कार्यवाहियों की रिपोर्टिंग करने से नहीं रोका जा सकेगा। सुप्रीम कोर्ट और सभी हाई कोर्ट्स को निर्देश दिया गया है कि वे इस आदेश को अपनी आधिकारिक वेबसाइट्स पर प्रकाशित करें ताकि इसका तत्काल पालन सुनिश्चित हो सके। आगे, कोर्ट इस बात की निगरानी करेगा कि हाई कोर्ट्स इन नई गाइडलाइंस को कैसे लागू करते हैं और भविष्य में रिकॉर्डेड कंटेंट के किसी भी प्रसार के लिए रिपोर्टिंग की ज़रूरतों को कैसे प्रबंधित करते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.