भारत के सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या **90,000** के पार पहुंच गई है। जजों के **4** नए पद मंजूर होने के बावजूद, नए केसों का आना पुराने मामलों के निपटारे से कहीं ज़्यादा है, जिससे कोर्ट पर दबाव बना हुआ है।
जजों की तैनाती के बाद भी क्यों बढ़ रहा है बैकलॉग?
भारत का सुप्रीम कोर्ट लगातार बढ़ रहे मुकदमों के बोझ से जूझ रहा है। 2025 के अंत तक लंबित मामलों की कुल संख्या 90,000 से अधिक हो गई है। हाल ही में केंद्रीय कैबिनेट ने जजों की स्वीकृत संख्या को 34 से बढ़ाकर 38 करने की मंजूरी दी है, लेकिन इसके बावजूद, नए केसों के आने की रफ़्तार पुराने मामलों के निपटारे से कहीं ज़्यादा है।
नए केसों का अंबार और अदालती क्षमता
नेशनल जूडिशियल डेटा ग्रिड के आंकड़ों के अनुसार, अकेले जनवरी से नवंबर 2025 के बीच, सुप्रीम कोर्ट में लगभग 10,000 नए मामले दर्ज हुए। यह स्थिति अदालती क्षमता और भारी वर्कलोड के बीच एक बड़े गैप को दर्शाती है। सुप्रीम कोर्ट सिर्फ संवैधानिक मामलों में ही नहीं, बल्कि अंतिम अपीलीय अदालत के तौर पर भी काम करता है, जिससे मामलों की संख्या लगातार बढ़ती रहती है।
स्पेशल लीव पिटीशन का बढ़ता बोझ
इस भीड़भाड़ का एक प्रमुख कारण स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) की भारी संख्या है, जो कोर्ट के 90% से अधिक वर्कलोड का हिस्सा हैं। ये पिटीशन देश भर की निचली अदालतों और ट्रिब्यूनलों के विभिन्न आदेशों के खिलाफ अपील की अनुमति देती हैं, जिससे लगातार मामलों की एक धारा बनती रहती है जो बेंच पर भारी पड़ जाती है। इसके अलावा, भारत में प्रति दस लाख लोगों पर जजों का अनुपात लगभग 15 है, जो 1987 के लॉ कमीशन की 50 जजों प्रति दस लाख की सिफारिश से काफी कम है। यह कमी न्यायपालिका की बढ़ती हुई लंबित मामलों की संख्या को निपटाने की क्षमता को सीमित करती है।
क्षेत्रीय बेंचों का प्रस्ताव और चुनौतियां
इन लॉजिस्टिक चुनौतियों से निपटने के लिए, क्षेत्रीय बेंचों की स्थापना पर चर्चाएं फिर से शुरू हो गई हैं। संविधान का अनुच्छेद 130 राष्ट्रपति की मंजूरी से सुप्रीम कोर्ट को दिल्ली के बाहर बैठने की अनुमति देता है, लेकिन इसके कार्यान्वयन पर अभी गहन बहस चल रही है। समर्थकों का सुझाव है कि चार क्षेत्रीय पीठें स्थापित करने से अपीलीय काम का बोझ कम हो सकता है, जिससे दिल्ली स्थित अदालत मुख्य रूप से संवैधानिक मामलों पर ध्यान केंद्रित कर सकेगी। हालांकि, आलोचकों को चिंता है कि इस तरह का विभाजन अदालत के राष्ट्रीय अधिकार को खंडित कर सकता है और कानूनी व्याख्याओं में असंगति पैदा कर सकता है।
आगे की राह
न्यायिक प्रणाली पर नज़र रखने वालों के लिए, मुख्य बात यह होगी कि क्या भविष्य में सरकारी आवंटन बेंच में केवल छोटी-मोटी वृद्धि से आगे बढ़ेंगे। पर्यवेक्षक अदालत की परिचालन संरचना में किसी भी औपचारिक बदलाव या अपीलों के प्रवाह को फ़िल्टर करने के उद्देश्य से संभावित नीति परिवर्तनों पर भी नज़र रखेंगे। न्यायिक प्रणाली की इस भार को प्रबंधित करने की क्षमता, देश भर में कानूनी मामलों के समय पर समाधान के लिए महत्वपूर्ण बनी हुई है, जिसका वाणिज्यिक और नागरिक न्याय की गति पर अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है।
