सुप्रीम कोर्ट ने 1993 बोउबाजार ब्लास्ट केस के दोषी Md Rashid Khan की जल्द रिहाई के दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी है। पश्चिम बंगाल सरकार ने इस फैसले के खिलाफ याचिका दायर की थी।
क्या हुआ?
सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को अंतरिम तौर पर रद्द कर दिया है, जिसके तहत Md Rashid Khan को समय से पहले रिहा करने की मंजूरी दी गई थी। खान को 1993 के बोउबाजार ब्लास्ट केस में दोषी ठहराया गया था। इस घटना में 69 लोगों की जान गई थी और 100 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। सुप्रीम कोर्ट का यह दखल पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा दायर एक अपील के बाद आया है, जिसमें उन्होंने हाईकोर्ट के जल्द रिहाई के फैसले को चुनौती दी है।
कानूनी पृष्ठभूमि
Md Rashid Khan को एक TADA (आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधियां) कोर्ट ने 2001 में दोषी ठहराया था। बाद में कलकत्ता हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। साल 2015 में पश्चिम बंगाल सरकार ने उसकी रिहाई का विरोध नहीं किया था। लेकिन, बाद में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने केंद्रीय कानूनों के तहत समय से पहले रिहाई के मामले में राज्य सरकारों की शक्तियों को सीमित कर दिया। इसी के चलते खान 2021 में दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचे, जिसने उनके पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि उन्होंने 33 साल से ज्यादा की सजा काट ली है और अब आगे की कैद का कोई खास मतलब नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप
सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस पी.के. मिश्रा और जस्टिस संजीव सच्चदेवा शामिल थे, ने इस अपराध की प्रकृति पर गंभीर चिंता जताई। बेंच ने इस घटना को आतंकवादी गतिविधि जैसा बताया, क्योंकि खान द्वारा रखे गए विस्फोटकों के कारण दो इमारतें ढह गईं और 69 लोगों की मौत हो गई। कोर्ट ने सवाल उठाया कि ऐसे मामले में समय से पहले रिहाई कैसे दी जा सकती है, और संकेत दिया कि खान इस घटना के मुख्य साजिशकर्ता (mastermind) थे।
खान के वकील ने उनकी रिहाई का समर्थन करते हुए उनकी मेडिकल स्थिति और एक सह-आरोपी को पहले ही पैरोल (remission) मिलने का हवाला दिया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने खान की भूमिका को दूसरों से अलग बताया और कहा कि अंतिम फैसले से पहले उसकी रिहाई की अनुमति देने से अपील अर्थहीन हो सकती है।
आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई को तय की है। कोर्ट ने खान को अगले चार हफ्तों के भीतर अपना औपचारिक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। कानूनी जानकारों के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या अपराध की गंभीरता, काटी गई सजा की अवधि पर हावी होती है, और क्या यह ऐसे ही अन्य हाई-प्रोफाइल आपराधिक मामलों के लिए एक मिसाल कायम करेगा।
