सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों की कस्टडी से जुड़े मामलों में मनोवैज्ञानिक जांच (Psychological Tests) को लेकर सख्त नए दिशानिर्देश जारी किए हैं। अब इन जांचों को आखिरी विकल्प माना जाएगा, ताकि बच्चों को अदालती कार्यवाही के तनाव से बचाया जा सके।
क्या है नया नियम?
सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच, जिसमें जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह शामिल थे, ने साफ कर दिया है कि बच्चों की कस्टडी के मामलों में मनोवैज्ञानिक जांच (Psychological Evaluation) को एक सामान्य प्रक्रिया की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। कोर्ट का मुख्य उद्देश्य बच्चों को कानूनी प्रक्रियाओं के दौरान होने वाले मानसिक तनाव और आघात से बचाना है।
क्यों अहम है यह फैसला?
कस्टडी की लड़ाई लड़ रहे परिवारों के लिए अदालतों द्वारा कराई जाने वाली मनोवैज्ञानिक जांचें अक्सर बच्चों के लिए चिंता का बड़ा कारण बनती रही हैं। कोर्ट ने माना है कि बार-बार या अनावश्यक जांचें बच्चों पर भावनात्मक दबाव बढ़ा सकती हैं, जो पहले से ही माता-पिता के अलगाव या विवाद से जूझ रहे होते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 'पेरेंस पैट्रिए' (Parens Patriae) के अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए कहा है कि राज्य का यह कर्तव्य है कि वह ऐसे मामलों में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करे।
नई कानूनी प्रक्रिया क्या होगी?
नए दिशानिर्देशों के तहत, परिवार अदालतों को एक विशेष क्रम का पालन करना होगा। किसी भी बच्चे की मनोवैज्ञानिक जांच का आदेश देने से पहले, अदालत को पहले दोनों माता-पिता की मानसिक स्थिति का आकलन करने के लिए एक विशेषज्ञ नियुक्त करना होगा, खासकर उस माता-पिता की जिसके पास वर्तमान में बच्चे की कस्टडी है। यदि विशेषज्ञ यह पाता है कि बच्चे की जांच अनावश्यक या हानिकारक है, तो प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई जाएगी।
सुरक्षा उपाय और जानकारी का खुलासा
इस फैसले में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय भी शामिल किए गए हैं। अब परिवार अदालतों को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे बच्चों के यौन अपराधों से संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत लंबित किसी भी कार्यवाही से अवगत रहें। यह जानकारी अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कस्टडी और मुलाक़ात के अधिकारों के संबंध में निर्णयों को मौलिक रूप से बदल सकती है। कोर्ट का यह कदम नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंस (NIMHANS) जैसे संस्थानों की विशेषज्ञ राय से भी प्रेरित है, जिन्होंने बताया है कि माता-पिता के बीच का संघर्ष बच्चों में गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है।
वादी और वकील क्या ध्यान रखें?
भविष्य में, परिवारों और कानूनी पेशेवरों के लिए मुख्य बात यह होगी कि निचली अदालतें और पारिवारिक न्यायाधिकरण इन निर्देशों को व्यवहार में कैसे लागू करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि जब जांचें आवश्यक हों, तो उन्हें स्वतंत्र बाल मनोवैज्ञानिकों द्वारा ही किया जाना चाहिए, और बच्चे को कम से कम परेशानी हो, इसका ध्यान रखा जाना चाहिए। कस्टडी के मामले अक्सर गतिशील होते हैं, इसलिए यह भी ध्यान रखना होगा कि परिस्थितियों के बदलने पर अदालतों द्वारा इन व्यवस्थाओं में संशोधन किया जा सकता है।
