PMLA के दायरे पर गंभीर सवाल
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने ED की संपत्ति ज़ब्त करने की आक्रामक रणनीति पर एक महत्वपूर्ण रोक लगा दी। यह रोक दिल्ली हाई कोर्ट के नवंबर 2025 के उस आदेश पर लगाई गई है, जिसमें ED को अवैध ऑनलाइन क्रिकेट सट्टेबाजी से 'अपराध की आय' (proceeds of crime) के तौर पर संपत्तियों को जब्त करने की अनुमति दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) की व्यापक व्याख्या पर एक गंभीर सवाल खड़े करता है।
हाई कोर्ट ने क्यों दी थी इजाजत?
इससे पहले, दिल्ली हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि सट्टेबाजी से जुड़ी धोखाधड़ी, जालसाजी और साजिश जैसे आपराधिक कृत्यों से अर्जित धन, जिसमें यूके-आधारित वेबसाइट Betfair.com के माध्यम से बड़ौदा के एक फार्महाउस से संचालित गतिविधियां शामिल थीं, PMLA की धारा 2(1)(u) के तहत 'अपराध की आय' मानी जाएंगी। ED ने दलील दी थी कि आरोपी 'सुपर मास्टर आईडी' खरीदकर KYC (Know Your Customer) नियमों को दरकिनार कर रहे थे, जिससे बड़े पैमाने पर अवैध सट्टेबाजी खाते चल रहे थे। हाई कोर्ट ने ED द्वारा इन संपत्तियों की अस्थायी कुर्की (provisional attachment) को बरकरार रखा था।
याचिकाकर्ताओं की मुख्य दलील और SC का अगला कदम
हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। उनका तर्क है कि PMLA के तहत ED को केवल उन्हीं अपराधों पर अधिकार क्षेत्र (jurisdiction) मिलता है जो इसके वैधानिक शेड्यूल (scheduled offenses) में सूचीबद्ध हैं। चूँकि ऑनलाइन सट्टेबाजी और जुआ इस सूची में शामिल नहीं हैं, इसलिए ED इन गतिविधियों से प्राप्त आय पर मनी-लॉन्ड्रिंग के मामले शुरू नहीं कर सकता। याचिकाकर्ताओं का यह भी कहना है कि ED, सट्टेबाजी की आय को सीधे तौर पर न जोड़कर, सिम कार्ड से जुड़े जालसाजी के अलग मामलों से जोड़कर कानून के दायरे को बढ़ाना चाहता है। सुप्रीम कोर्ट ने अब ED को नोटिस जारी कर इन तर्कों पर जवाब मांगा है।