सिक्योरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल (SAT) ने Bhartiya Global Infomedia के तीन पूर्व इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स की याचिकाओं को खारिज कर दिया है। यह फैसला 2011 के IPO धोखाधड़ी मामले से जुड़ा है, जिसमें SEBI के आदेश को चुनौती दी गई थी।
IPO धोखाधड़ी मामले में बड़ा फैसला
SAT ने Bhartiya Global Infomedia के तीन पूर्व डायरेक्टर्स - हरजीत सिंह आनंद, आरती भाटिया और संजय कपूर - की याचिकाओं को ठुकरा दिया है। ये डायरेक्टर्स 2011 के इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) से जुड़े SEBI के एक पुराने आदेश को चुनौती देने की कोशिश कर रहे थे। इस आदेश में फंड डायवर्जन और जानकारी छिपाने जैसे आरोप शामिल थे।
डायरेक्टर्स का बचाव और SAT का जवाब
तीनों डायरेक्टर्स ने अपनी याचिका में कहा था कि वे कंपनी के दिन-प्रतिदिन के कामकाज में शामिल नहीं थे और उन्हें बोर्ड रेजोल्यूशन के तहत छूट मिली हुई थी। उन्होंने यह भी दावा किया कि पहले के मूल्यांकनों में फंड डायवर्जन की बात सामने नहीं आई थी।
हालांकि, SAT की बेंच ने इन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि SEBI का मूल आदेश, जिसमें ₹6 करोड़ का जुर्माना भी शामिल था, अब अंतिम हो चुका है। SAT ने जोर देकर कहा कि चूंकि इस मामले को पहले ही सुप्रीम कोर्ट सहित उच्च न्यायिक प्राधिकरणों द्वारा पुष्टि मिल चुकी है, इसलिए इसे अब दोबारा नहीं खोला जा सकता।
आपराधिक कार्यवाही पर क्या होगा असर?
वित्तीय जुर्माने के अलावा, इस फैसले का लंबित आपराधिक मुकदमों पर भी असर पड़ेगा। पूर्व डायरेक्टर्स SEBI स्पेशल कोर्ट में चल रही आपराधिक कार्यवाही को रोकने की मांग कर रहे थे। SAT ने साफ किया कि ऐसे आपराधिक मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार ट्रिब्यूनल के पास नहीं है। SAT ने यह भी कहा कि ऐसी किसी भी कार्यवाही की वैधता या आवश्यकता को लेकर कोई भी चुनौती उपयुक्त हाई कोर्ट में दी जानी चाहिए।
यह फैसला इस सिद्धांत को पुख्ता करता है कि एक इंडिपेंडेंट डायरेक्टर होने का मतलब नियामक जवाबदेही से छूट नहीं है। IPO के दौरान धोखाधड़ी जैसे गंभीर मामलों में, नियामक संस्थाएं और अदालतें बोर्ड के सदस्यों को उनकी निगरानी की जिम्मेदारियों के लिए तेजी से जवाबदेह ठहरा रही हैं।
निवेशकों के लिए, यह मामला छोटी लिस्टेड कंपनियों में गवर्नेंस की खामियों से जुड़े जोखिमों की याद दिलाता है। हालांकि यह घटना 2011 की है, लेकिन लगातार कानूनी कार्रवाई नियामक अनुपालन न करने के कंपनी प्रबंधन और हितधारकों पर पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभाव को उजागर करती है। निवेशकों को यह देखना चाहिए कि क्या इस लंबे समय से चल रहे मुकदमे का कंपनी की गवर्नेंस पर असर जारी रहता है या SEBI स्पेशल कोर्ट या हाई कोर्ट में कार्यवाही से कोई नया मोड़ आता है।
