पुणे कोर्ट का बड़ा फैसला: 65 साल के शख्स को बच्ची से रेप और हत्या के मामले में फांसी की सज़ा

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AuthorNeha Patil|Published at:
पुणे कोर्ट का बड़ा फैसला: 65 साल के शख्स को बच्ची से रेप और हत्या के मामले में फांसी की सज़ा

पुणे की एक विशेष POCSO कोर्ट ने 65 वर्षीय भीमराव प्रभाकर कांबले को तीन साल की बच्ची के साथ रेप और हत्या के जुर्म में मौत की सज़ा सुनाई है। जज एसआर सालुंखे ने इस मामले को 'दुर्लभ से दुर्लभतम' करार दिया है, क्योंकि इसमें अत्यधिक क्रूरता बरती गई थी। यह फैसला घटना के दो महीने से भी कम समय में आया है, जिसमें जांच और मुकदमे की प्रक्रिया तेजी से पूरी की गई।

क्या हुआ?

पुणे की एक विशेष पॉक्सो (POCSO) कोर्ट ने 65 वर्षीय भीमराव प्रभाकर कांबले को तीन साल की बच्ची के साथ रेप और हत्या के मामले में मौत की सज़ा का ऐलान किया है। यह फैसला जज एसआर सालुंखे ने 29 जून, 2026 को सुनाया। कोर्ट ने इस मामले को 'दुर्लभ से दुर्लभतम' की श्रेणी में रखा, जिसमें अपराध की अत्यधिक क्रूरता और पीड़ित की असहायता पर जोर दिया गया। यह फैसला एक ऐसी कानूनी प्रक्रिया का निष्कर्ष है जो बेहद तेज रही, जिसमें अपराध की रिपोर्ट होने के महज 16 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल कर दी गई थी।

मामले का विवरण

यह घटना 1 मई, 2026 को पुणे में हुई थी। कोर्ट की कार्यवाही के अनुसार, आरोपी, जो एक स्थानीय मंदिर में दिहाड़ी मजदूर के तौर पर काम करता था, ने बच्ची को खाने का लालच देकर परिसर से बाहर बुलाया। इसके बाद वह पीड़ित को पास की एक गोशाला में ले गया, जहाँ अपराध हुआ। जांचकर्ताओं ने ऑडियो-विजुअल सबूत और सीसीटीवी फुटेज बरामद किए, जिसमें आरोपी को बच्ची को उस जगह ले जाते हुए और अकेले लौटते हुए दिखाया गया था। यह फुटेज अभियोजन पक्ष के मामले का एक अहम हिस्सा बना।

सज़ा के कानूनी आधार

कोर्ट ने कांबले को भारतीय न्याय संहिता, 2023 और पॉक्सो एक्ट, 2012 के तहत दोषी करार दिया। जज ने इस बात पर प्रकाश डाला कि पीड़ित के शरीर पर 18 चोटों के निशान और आरोपी का पश्चाताप की कमी, सज़ा सुनाने के प्रमुख कारण थे। कोर्ट ने देखा कि देश भर में बच्चों के खिलाफ होने वाले कई हाई-प्रोफाइल मामलों के बावजूद, ऐसी घटनाएं जारी हैं। जज सालुंखे ने कहा कि आरोपी की उम्र और पृष्ठभूमि पर विचार किया गया, लेकिन अपराध की गंभीरता को देखते हुए समाज की सुरक्षा और अंतरात्मा के लिए मौत की सज़ा आवश्यक थी।

मुकदमे की तेज़ी

इस मामले का एक अहम पहलू जांच और मुकदमे की अवधि रही। कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने घटना के 16 दिनों के भीतर जांच पूरी कर ली और चार्जशीट दाखिल कर दी। पूरा मुकदमा दो महीने से भी कम समय में समाप्त हो गया। कोर्ट ने त्वरित कानूनी कार्रवाई की सराहना की, जो बच्चों के खिलाफ गंभीर अपराधों के मामलों में न्याय देने के प्रति एक दृढ़ रुख को दर्शाता है। आरोपी द्वारा जेल अधिकारियों या प्रोबेशन अधिकारियों से अनुकूल रिपोर्ट हासिल करने के प्रयास असफल रहे, और कोर्ट को सज़ा कम करने के लिए कोई भी कम करने वाले कारक नहीं मिले।

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