वंदे मातरम का अपमान करने पर अब होगी जेल! सरकार लाई नया बिल

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AuthorNeha Patil|Published at:
वंदे मातरम का अपमान करने पर अब होगी जेल! सरकार लाई नया बिल

भारत सरकार 'वंदे मातरम' को कानूनी सुरक्षा देने के लिए 'राष्ट्रीय सम्मान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक' पेश करने की योजना बना रही है। यदि यह विधेयक पारित हो जाता है, तो इस राष्ट्रीय गीत का अपमान करने पर तीन साल तक की जेल की सजा हो सकती है। संसद के आगामी मानसून सत्र में इस विधायी कदम से तीखी बहस छिड़ने की उम्मीद है।

वंदे मातरम को मिलेगी राष्ट्रीय गान जैसी सुरक्षा?

केंद्र सरकार संसद के आगामी मानसून सत्र में 'राष्ट्रीय सम्मान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक' लाने की तैयारी में है। इस प्रस्तावित कानून का मकसद 'वंदे मातरम' जैसे राष्ट्रीय गीत को कानूनी सुरक्षा देना है, ठीक वैसे ही जैसे राष्ट्रीय गान, राष्ट्रीय ध्वज और संविधान को मिली हुई है।

इस ड्राफ्ट बिल के अनुसार, जो कोई भी 'वंदे मातरम' के गायन के दौरान जानबूझकर अपमान करता है, बाधा डालता है या व्यवधान पैदा करता है, उसे तीन साल तक की जेल की सजा, जुर्माना या दोनों से दंडित किया जा सकता है। यह कदम सरकार द्वारा गीत की रचना की 150वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में चलाए गए एक साल के सरकारी समारोह के बाद उठाया जा रहा है।

ऐतिहासिक और राजनीतिक संदर्भ

'वंदे मातरम' को बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में लिखा था और यह उनके उपन्यास 'आनंदमठ' में शामिल है। यह गीत दशकों से ऐतिहासिक और राजनीतिक चर्चा का विषय रहा है। 1937 में, जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने गीत की केवल पहली दो पंक्तियों को अपनाया था। इस फैसले के पीछे कुछ समुदाय समूहों द्वारा बाद की पंक्तियों की सामग्री को लेकर जताई गई चिंताओं का हाथ था।

हाल के वर्षों में, भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इस ऐतिहासिक फैसले का बार-बार उल्लेख किया है, यह तर्क देते हुए कि गीत को छोटा करने का कारण राजनीतिक सुविधा थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1937 के फैसले को देश के बाद के विभाजन से जोड़ा है, जिसका मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे विपक्षी नेताओं ने खंडन किया है। विपक्ष का कहना है कि प्रारंभिक पंक्तियों का उपयोग करने का निर्णय महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे प्रमुख हस्तियों सहित एक सामूहिक सहमति थी।

संसदीय परिदृश्य

राजनीतिक विश्लेषकों को उम्मीद है कि इस विधेयक को पेश करने से आगामी संसदीय सत्र में काफी टकराव होगा। जहां सरकार का मानना ​​है कि यह कानून गीत की स्थिति को औपचारिक बनाने और यह सुनिश्चित करने के लिए एक आवश्यक कदम है कि इसे अन्य राष्ट्रीय प्रतीकों के समान सम्मान मिले, वहीं विपक्षी दल विधेयक के समय और प्रकृति को ऐतिहासिक वैचारिक मतभेदों को उजागर करने के कदम के रूप में देख सकते हैं। जैसे ही विधेयक पेश होने की ओर बढ़ेगा, पर्यवेक्षकों के लिए मुख्य फोकस संसदीय बहस और आधिकारिक राज्य समारोहों में इसके अनिवार्य उपयोग के आसपास नए नियमों की संभावना होगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.