कोर्ट का फैसला: प्रक्रियात्मक जीत, आरोपों पर चुप्पी
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के IPO का रास्ता साफ हो गया है। दिल्ली हाई कोर्ट ने SEBI द्वारा NSE को IPO के लिए दिए गए 'नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' (NOC) को चुनौती देने वाली एक याचिका को 16 फरवरी 2026 को खारिज कर दिया है। जस्टिस जसमीत सिंह की अदालत ने यह फैसला याचिकाकर्ता KC Aggarwal की याचिका पर सुनाया। महत्वपूर्ण बात यह है कि कोर्ट ने यह फैसला सिर्फ क्षेत्राधिकार (Territorial Jurisdiction) के आधार पर लिया है, क्योंकि SEBI और NSE दोनों मुंबई में स्थित हैं और NOC वहीं जारी हुआ था, इसलिए दिल्ली हाई कोर्ट सुनवाई के लिए सही मंच नहीं था। इस फैसले से NSE अब 'ऑफर फॉर सेल' (OFS) की तैयारी के साथ आगे बढ़ सकता है।
वैल्यूएशन, मार्केट का मिजाज और इतिहास
NSE का IPO, जो एक OFS के रूप में स्ट्रक्चर किया गया है, भारत के सबसे बड़े पब्लिक लिस्टिंग में से एक बनने की ओर अग्रसर है। अनलिस्टेड मार्केट में इसकी वैल्यूएशन ₹5 लाख करोड़ के करीब पहुँच चुकी है, जो प्रति शेयर लगभग ₹2,075 है। यह एक प्रीमियम वैल्यूएशन माना जा रहा है, जिसका P/E मल्टीपल लगभग 55x है। इसकी तुलना में, घरेलू प्रतिद्वंद्वी बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) का मार्केट कैप करीब ₹11,1419.32 करोड़ है और उसका P/E करीब 40x है। फाइनेंशियल ईयर 26 (FY26) में भारतीय IPO मार्केट काफी सक्रिय रहा है, लेकिन 2026 की शुरुआत में मार्केट में थोड़ी नरमी देखी गई है, जहाँ कुछ नई लिस्टिंग इश्यू प्राइस से नीचे कारोबार कर रही हैं। यह निवेशकों के सतर्क रवैये को दर्शाता है।
NSE के लिए लिस्टिंग का सफर लंबा रहा है, जो 2016 से ही कई बार टाला गया है। पहले इसे को-लोकेशन प्रैक्टिसेस, गवर्नेंस लैप्स और कंप्लायंस से जुड़े बड़े रेगुलेटरी जांच का सामना करना पड़ा था, जिसके कारण भारी जुर्माने और IPO प्लान्स को रद्द करना पड़ा था। NSE ने इन मुद्दों को सुलझाने के लिए कदम उठाए हैं, जिसमें को-लोकेशन और ट्रेडिंग एक्सेस पॉइंट सिस्टम से जुड़ा ₹643 करोड़ का सेटलमेंट अक्टूबर 2024 तक पूरा करना शामिल है। इन ऐतिहासिक घटनाओं ने इसके लिस्टिंग के रास्ते को जटिल बना दिया है।
⚠️ अनसुलझे सवाल और गंभीर आरोप
दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले से भले ही प्रक्रियात्मक बाधा दूर हो गई हो, लेकिन यह समझना महत्वपूर्ण है कि याचिकाकर्ता KC Aggarwal द्वारा उठाए गए मुख्य आरोप अदालत में सुने ही नहीं गए। Aggarwal की याचिका में दावा किया गया था कि SEBI ने कथित तौर पर हुए गैर-कानूनी डेबिट्स और कॉर्पोरेट एक्शन एडजस्टमेंट मैकेनिज्म के दुरुपयोग की पर्याप्त जांच नहीं की। खास तौर पर, यह आरोप लगाया गया था कि NSE ने डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट की कीमतों में हेरफेर किया और डिविडेंड-इक्विवेलेंट अमाउंट को सीधे डेबिट किया, जो बोनस इश्यू या स्टॉक स्प्लिट जैसी कॉर्पोरेट घटनाओं के दौरान वैल्यू न्यूट्रैलिटी बनाए रखने के लिए बने फ्रेमवर्क से अलग था। इन आरोपों की मेरिट्स पर कोर्ट ने क्षेत्राधिकार के मुद्दे के कारण कोई फैसला नहीं सुनाया।
इसके अलावा, Aggarwal ने पारदर्शिता की कमी का भी जिक्र किया था, जिसमें SEBI पर NSE की कार्रवाइयों को बिना स्वतंत्र समीक्षा के समर्थन देने और RTI एक्ट के तहत बार-बार जानकारी के अनुरोधों को अस्वीकार करने का आरोप लगाया गया था। यह सब कुछ एक्सचेंज की कुछ प्रैक्टिसेस की ऑपरेशनल इंटीग्रिटी और फेयरनेस पर बड़ा सवाल खड़ा करता है, जो न्यायिक प्रक्रिया से अनसुलझा रह गया है। OFS स्ट्रक्चर का मतलब यह भी है कि मौजूदा शेयरधारक अपनी हिस्सेदारी बेच रहे हैं, न कि NSE पूंजी जुटा रहा है, जो आम IPO के उद्देश्यों से अलग है।
आगे का रास्ता
क्षेत्राधिकार से जुड़ा कानूनी मामला सुलझ जाने के बाद, NSE अब अपने OFS के साथ आगे बढ़ सकता है। हालांकि, डेरिवेटिव एडजस्टमेंट और कथित वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े अनसुलझे आरोप एक संभावित ओवरहैंग बने रहेंगे। निवेशक और मार्केट पार्टिसिपेंट्स SEBI की निगरानी और OFS में प्राइस डिस्कवरी प्रक्रिया के दौरान पारदर्शिता पर कड़ी नजर रखेंगे। IPO के लिए प्रस्तावित उच्च वैल्यूएशन यह दर्शाता है कि बाजार में पहले से ही काफी ग्रोथ की उम्मीदें शामिल हैं, इसलिए गवर्नेंस और ऑपरेशनल स्टैंडर्ड्स का एग्जीक्यूशन सर्वोपरि होगा। लंबे समय से चल रही देरी और रेगुलेटरी जांच को देखते हुए, भले ही प्रक्रियात्मक बाधा दूर हो गई हो, NSE के IPO सफर में इसके फंडामेंटल ऑपरेशनल और गवर्नेंस फ्रेमवर्क को लेकर जांच बनी रह सकती है।