ED की ताबड़तोड़ रेड, अनलिस्टेड NSE शेयर्स में फ्रॉड का खुलासा!
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 27 फरवरी को मुंबई और चेन्नई में Atum Capital Pvt Ltd सहित चार कंपनियों पर मनी लॉन्ड्रिंग (money laundering) के शक में ताबड़तोड़ छापेमारी की। जांचकर्ताओं का आरोप है कि एक गिरोह ने NSE India Ltd के 'अनलिस्टेड' शेयर्स का झांसा देकर निवेशकों को ठगा। गिरोह ने निजी शेयर खरीद समझौतों (private share purchase agreements) के जरिए प्रीमियम अलॉटमेंट का झूठा वादा कर निवेशकों से ठगी की। NSE के IPO (Initial Public Offering) की बढ़ती उम्मीदों के बीच प्राइवेट मार्केट में इन शेयर्स की मांग बेतहाशा बढ़ी थी, जिसका फायदा उठाते हुए यह फर्जीवाड़ा किया गया। ED ने इस कार्रवाई में प्रॉपर्टी डॉक्यूमेंट्स जब्त किए हैं और कई बैंक व डीमैट खातों को फ्रीज कर दिया है, जिससे कथित तौर पर अपराध से प्राप्त आय (proceeds of crime) को डायवर्ट किया गया था।
अनलिस्टेड मार्केट कीopacity और रेगुलेटरी गैप्स का फायदा
इस पूरे फ्रॉड की जड़ अनलिस्टेड शेयर मार्केट की पारदर्शिता की कमी और सीमित रेगुलेशन में है। सार्वजनिक एक्सचेंजों (public exchanges) जैसे NSE या BSE पर ट्रेड होने वाले शेयरों के विपरीत, प्राइवेट शेयर ट्रांजैक्शन (private share transactions) किसी औपचारिक सेटलमेंट मैकेनिज्म (settlement mechanisms) के तहत नहीं आते। इस कमी का फायदा उठाते हुए, SEBI (Securities and Exchange Board of India) भी इस बढ़ते अनलिस्टेड शेयर मार्केट पर अपने रेगुलेटरी फ्रेमवर्क (regulatory framework) को लागू करने की संभावना तलाश रहा है। ED की जांच से पता चला कि आरोपी पार्टियों ने निवेशकों से भारी एडवांस पेमेंट (advance payments) लेने के लिए इन गैप्स का पूरा फायदा उठाया।
NSE का प्रीमियम वैल्यूएशन और BSE से तुलना
NSE India Ltd, देश के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज के तौर पर, अनलिस्टेड मार्केट में भारी वैल्यूएशन (valuation) रखती है। अनुमानों के मुताबिक, इसका मार्केट कैपिटलाइजेशन (market capitalization) लगभग ₹500,000 करोड़ है, और इसका P/E रेशियो (P/E ratio) लगभग 41.3x है। इसके अनलिस्टेड शेयर की कीमत मार्च 2026 की शुरुआत में लगभग ₹2000-₹2080 के बीच ट्रेड कर रही थी। यह वैल्यूएशन इसके लिस्टेड प्रतिस्पर्धी BSE Ltd. (जिसका मार्केट कैप लगभग ₹106,836 करोड़ था) से कहीं ज्यादा है। NSE की प्रमुख सेगमेंट में 90% से अधिक मार्केट शेयर इसकी प्रीमियम वैल्यूएशन की वजह है। हालांकि, SEBI चेयरमैन तुहिन कांता पांडे ने इन अनलिस्टेड कीमतों और IPO बुक-बिल्डिंग (book-building) प्रक्रिया के दौरान तय होने वाली वैल्यूएशन के बीच संभावित अंतर पर चिंता जताई है, जो निवेशकों के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।
IPO की राह में सिस्टमैटिक रिस्क और गवर्नेंस की चुनौतियां
NSE के अनलिस्टेड शेयर फ्रॉड की यह जांच, एक्सचेंज के 2026 के अंत तक पब्लिक लिस्टिंग (public listing) की राह पर सवाल खड़े करती है। सबसे बड़ा खतरा यह है कि एक बड़े IPO के आसपास की सट्टा (speculative) गर्मी, कम रेगुलेटेड अनलिस्टेड मार्केट में धोखाधड़ी को बढ़ावा दे सकती है। अगर ऐसी योजनाएं व्यापक हो जाती हैं, तो इससे रेगुलेटरी हस्तक्षेप (regulatory intervention) बढ़ सकता है, जिससे IPO प्रक्रिया में देरी या जटिलता आ सकती है। इसके अलावा, अनलिस्टेड स्पेस में ट्रांसपेरेंट वैल्यूएशन मैकेनिज्म (transparent valuation mechanisms) की कमी का मतलब है कि निजी तौर पर तय की गई कीमतें फंडामेंटल वैल्यू (fundamental value) को नहीं दर्शा सकतीं, जिससे निवेशकों को भारी डाउनसाइड रिस्क (downside risk) का सामना करना पड़ सकता है।
IPO की तैयारी जारी, पर निवेशकों को बरतनी होगी सावधानी
इस जांच के बावजूद, NSE का IPO अपनी तय समय-सीमा अगले सात से आठ महीनों में लिस्टिंग के लिए ट्रैक पर है। यह ऑफर एक शुद्ध ऑफर फॉर सेल (Offer For Sale - OFS) होने की उम्मीद है, जिसका मतलब है कि यह मौजूदा शेयरधारकों को लिक्विडिटी (liquidity) प्रदान करने पर केंद्रित होगा, न कि फ्रेश कैपिटल जुटाने पर। कीमतों का निर्धारण मार्केट की स्थितियों और एक्सचेंज की लॉन्ग-टर्म प्रॉफिटेबिलिटी (long-term profitability) के आधार पर किया जाएगा। हालांकि, हालिया ED की कार्रवाई NSE के लिए बाजार की अखंडता (market integrity) सुनिश्चित करने की चुनौतियों को उजागर करती है। SEBI द्वारा अनलिस्टेड मार्केट के रेगुलेशन की संभावना नए कंप्लायंस हर्डल्स (compliance hurdles) पेश कर सकती है। निवेशकों को अत्यधिक सावधानी बरतने, विक्रेता के स्वामित्व और ट्रांसफर प्रक्रियाओं को ठीक से सत्यापित करने की सलाह दी जाती है।
