यह कानूनी पचड़ा फाउंडर्स और एग्रीगेटर के बीच विश्वास और ऑपरेशनल तालमेल में आई एक बड़ी दरार के कारण उपजा है, जो अधिग्रहण के माध्यम से तेजी से विस्तार (Rapid Scaling) की व्यवहार्यता पर सवाल उठाता है। आरोप हैं कि अनावश्यक शुल्क और संबंधित संस्थाओं को अनुचित सेवा भुगतान, Mensa की कंसॉलिडेशन स्ट्रैटेजी और MyFitness जैसे एक्वायर किए गए ब्रांडों की वित्तीय अखंडता के बीच संभावित अलगाव का संकेत देते हैं।
वैल्यूएशन का टकराव और गवर्नेंस में गिरावट
इस विवाद की जड़ MyFitness के फाउंडर्स, मोहम्मद पटेल और रहिल विरानी के वो आरोप हैं, जिनमें उन्होंने दावा किया है कि D2C एग्रीगेशन स्पेस में एक बड़े खिलाड़ी, Mensa Brands ने ₹40-50 करोड़ की भारी रकम को बाहर निकाला है। यह रकम कथित तौर पर भारी-भरकम वेयरहाउसिंग फीस और कंपनी के भीतर ही सर्विसेज के लिए गलत तरीके से पेमेंट के जरिए निकाली गई। इन आरोपों के मुताबिक, इन सब तिकड़मों के चलते MyFitness, जो पहले मुनाफे में थी, अब घाटे में चल रही है, जबकि रेवेन्यू लगातार बढ़ रहा है। फाउंडर्स ने यह भी आरोप लगाया है कि बोर्ड मीटिंग्स के मिनट्स को जाली किया गया और उन्हें अहम फैसलों से दूर रखा गया। यह मामला तब और गंभीर हो जाता है जब हम जानते हैं कि Mensa Brands, जिसके फाउंडर पूर्व Myntra CEO अनंथ नारायणन हैं, तेजी से अपने एक्वायर किए गए ब्रांड्स को बड़ा करना चाहती है। Mensa Brands ने नवंबर 2021 में $1.2 बिलियन के वैल्यूएशन के साथ यूनिकॉर्न का दर्जा हासिल किया था।
Mensa का बचाव और पलटवार
दूसरी ओर, Mensa Brands ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। कंपनी का कहना है कि यह याचिका फाउंडर्स की ओर से चल रहे कॉन्ट्रैक्टुअल मामलों के जवाब में की गई है। Mensa का दावा है कि MyFitness के फाउंडर्स खुद एक्विजिशन एग्रीमेंट का उल्लंघन कर रहे हैं। कंपनी ने जिन डिफॉल्ट्स (Defaults) का जिक्र किया है, उनमें कंपनी में निवेश के बाद प्रतिस्पर्धी बिजनेस खड़ा करना, संबंधित एंटिटीज में अपनी हिस्सेदारी छिपाना और 2023 में एग्रीमेंट के विपरीत जाकर कंपनी की एंप्लॉई पोस्ट से इस्तीफा देना शामिल है। Mensa Brands का कहना है कि फाउंडर्स के इन डिफॉल्ट्स के चलते उनके पास बाकी शेयर्स खरीदने का कॉन्ट्रैक्टुअल राइट (Contractual Right) है।
D2C Aggregator Model पर उठते सवाल
यह विवाद भारत के D2C Aggregator Model के लिए एक बड़ी चेतावनी है। जहां Mensa Brands, GlobalBees जैसी कंपनियां इस सेक्टर को कंसॉलिडेट (Consolidate) करने का लक्ष्य रखती हैं, वहीं इस मॉडल में इंटीग्रेशन, फाउंडर-इन्वेस्टर के भरोसे और वैल्यूएशन को लेकर इनहेरेंट रिस्क (Inherent Risks) हैं। NCLT की दखलअंदाजी, जिसने शेयर बायआउट को रोका है, यह साफ करती है कि ऐसे विवाद ग्रोथ स्ट्रैटेजी को बाधित कर सकते हैं और एक्वायर्ड पोर्टफोलियो को मैनेज करने के तरीके में मौजूद कमजोरियों को उजागर कर सकते हैं। Mensa Brands जैसी कंपनियों की आक्रामक ग्रोथ और तेजी से हासिल हुए $1.7 बिलियन के वैल्यूएशन (जुलाई 2023) पर अब उनके ऑपरेशनल इंटीग्रेशन और गवर्नेंस प्रैक्टिस को लेकर ज्यादा बारीकी से नजर रखी जाएगी।
वित्तीय अनियमितता और कॉन्ट्रैक्टुअल विवाद
फंड डायवर्जन और बोर्ड मिनट्स में हेरफेर के आरोप, अगर सच साबित हुए, तो कॉर्पोरेट गवर्नेंस का गंभीर उल्लंघन हैं। कंपनी एक्ट 2013 की धारा 241 के तहत, सदस्यों को उत्पीड़न और कुप्रबंधन के खिलाफ NCLT से राहत मांगने का अधिकार है। NCLT के पास धारा 242 के तहत अंतरिम आदेश पारित करने की शक्ति है, जैसा कि उसने 19 मार्च, 2026 तक बायआउट को रोकने का फैसला करके दिखाया है। Mensa की फाउंडर्स पर प्रतिस्पर्धी एक्शन और जल्दी इस्तीफे जैसे डिफॉल्ट्स के काउंटर-क्लेम्स (Counter-claims) एक जटिल कॉन्ट्रैक्टुअल डिस्प्यूट (Contractual Dispute) की ओर इशारा करते हैं। ऐसे कानूनी मामले कंपनी की प्रतिष्ठा और इन्वेस्टर के भरोसे को नुकसान पहुंचा सकते हैं, खासकर ऐसे मॉडल के लिए जो कई ब्रांड्स को एक्वायर करके बढ़ाने पर निर्भर करता है।
आगे क्या?
NCLT के अंतरिम आदेश ने Mensa Brands की बायआउट स्ट्रैटेजी पर फिलहाल ब्रेक लगा दिया है, जब तक कि आरोपों की विस्तृत जांच नहीं हो जाती। 19 मार्च, 2026 को होने वाली अगली सुनवाई में यह तय होगा कि क्या ये आरोप आगे की जांच के लायक हैं या Mensa अपने कॉन्ट्रैक्टुअल अधिकारों के साथ आगे बढ़ सकती है। यह मामला D2C एग्रीगेशन सेक्टर में फाउंडर-इन्वेस्टर विवादों को कैसे सुलझाया जाएगा, इसके लिए एक मिसाल (Precedent) कायम कर सकता है। बाजार देखेगा कि NCLT का यह हस्तक्षेप निवेशकों के नियंत्रण, फाउंडर्स के अधिकारों और कॉर्पोरेट गवर्नेंस के मानकों को संतुलित करने वाला समाधान निकाल पाता है या नहीं।