प्राइवेसी की बढ़ती अहमियत, Meta पर कसा कानून का शिकंजा
टेक दिग्गजों के लिए नियम-कायदे तेजी से बदल रहे हैं। Meta Platforms (META) जैसी बड़ी कंपनियों को अब सीधे तौर पर यूजर की प्राइवेसी से जुड़े नियमों का सामना करना पड़ेगा, पहले की तरह केवल प्रतियोगिता कानून (competition law) के जरिये अप्रत्यक्ष निगरानी के बजाय। भारत का डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट (DPDP Act) इसी बदलाव का एक बड़ा उदाहरण है, जो डेटा के इस्तेमाल पर यूजर के अधिकारों को सर्वोपरि रखता है।
प्रतियोगिता कानून से सीधा प्राइवेसी एनफोर्समेंट
कई सालों तक, प्राइवेसी से जुड़े मुद्दों को अक्सर प्रतियोगिता कानून के दायरे में ही उठाया जाता था। अगर कोई कंपनी अपने बड़े मार्केट शेयर का फायदा उठाकर यूजर डेटा का अनुचित इस्तेमाल करती थी, तो उस पर कार्रवाई होती थी। भारत में भी, कंपटीशन कमीशन ऑफ इंडिया (CCI) ने Meta के WhatsApp की प्राइवेसी पॉलिसी को लेकर 'ले लो या छोड़ दो' (take-it-or-leave-it) जैसे मॉडल को डोमिनेंस का दुरुपयोग माना था। लेकिन यह सीधा प्राइवेसी का उल्लंघन नहीं माना गया था, जिससे कानूनी अनिश्चितता बनी रहती थी।
DPDP Act: सीधा नियम लागू
DPDP Act ने इस तस्वीर को पूरी तरह बदल दिया है। यह कानून सीधे तौर पर यूजर की प्राइवेसी की रक्षा करता है। इसके तहत, कंपनियों को यूजर से 'फ्री, स्पेसिफिक, इन्फॉर्म्ड, अनकंडीशनल और अनएम्बिग्यूअस' (free, specific, informed, unconditional, and unambiguous) सहमति लेनी होगी। इतना ही नहीं, अब डेटा रखने वाली कंपनियों (data fiduciaries) को यह साबित करना होगा कि उन्होंने यूजर की सहमति सही और कानूनी तरीके से हासिल की है। यह कानून सभी साइज की कंपनियों पर लागू होगा, जिससे बड़ी कंपनियों के लिए अनुपालन (compliance) करना और भी महत्वपूर्ण हो गया है। Meta ने भी माना है कि DPDP Act के अनुपालन के लिए 12-18 महीनों का समय बाकी ग्लोबल कानूनों की तुलना में कम है, जो एक बड़ी चुनौती है।
Meta के लिए बढ़ी मुश्किलें
Meta Platforms, जिसकी मार्केट कैप करीब $1.64 ट्रिलियन है और P/E रेश्यो लगभग 27.4 के आसपास है, इस नए रेगुलेटरी माहौल से सीधे तौर पर प्रभावित हो रही है। कंपनी के शेयर, जो करीब $657.01 पर ट्रेड कर रहे हैं, पर ग्लोबल रेगुलेटरी एक्शन का भी दबाव बना हुआ है। हाल ही में, कंपनी के CFO Susan J. Li और COO Javier Olivan ने अपने बड़े शेयर बेचे हैं। Meta अब भारतीय यूजर्स के लिए अपने विभिन्न सर्विसेज के बीच डेटा शेयरिंग पर सहमति के नियम और सख्त कर रही है। यह कदम WhatsApp की 2021 प्राइवेसी पॉलिसी को लेकर CCI द्वारा लगाए गए ₹213.14 करोड़ के जुर्माने के बाद उठाया गया है। इसके अलावा, NCLAT के निर्देशों के अनुसार, कंपनी 16 मार्च तक विज्ञापन डेटा पर भी प्राइवेसी गाइडलाइंस को लागू करने की प्रक्रिया में है।
ग्लोबल दबाव और प्रतिस्पर्धी
यह रेगुलेटरी दबाव सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। यूरोप में, Meta पर डेटा ट्रांसफर को लेकर कई बड़े जुर्माने लगे हैं, जिनमें मई 2023 में €1.2 बिलियन और 2023 की शुरुआत में €390 मिलियन का जुर्माना शामिल है। यूरोप का डिजिटल सर्विसेज एक्ट (DSA) टारगेटेड विज्ञापन पर रोक लगाता है, खासकर नाबालिगों (minors) और संवेदनशील डेटा के इस्तेमाल पर, जो Meta के मुख्य रेवेन्यू मॉडल को सीधे तौर पर प्रभावित करता है।
इसके विपरीत, Apple जैसी कंपनियां यूजर प्राइवेसी को कहीं ज्यादा महत्व दे रही हैं। Apple अपने App Tracking Transparency (ATT) फीचर के माध्यम से डेटा कलेक्शन और ट्रैकिंग को सीमित कर रही है। Meta, जो हर यूजर से लगभग 39 डेटा पॉइंट्स इकट्ठा करती है, Apple के प्राइवेसी-सेंट्रिक मॉडल से काफी अलग है।
एनालिस्ट्स की मिली-जुली राय
एनालिस्ट्स (Analysts) Meta के शेयरों को लेकर मिली-जुली राय रखते हैं। मौजूदा समय में, शेयर का औसतन टारगेट प्राइस $735.09 है और 'Outperform' की रेटिंग दी गई है। हालांकि, कुछ वैल्यूएशन मॉडल (valuation models) में आगे चलकर कुछ गिरावट की आशंका भी जताई गई है।
भविष्य की राह
Meta Platforms का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह अपने डेटा-केंद्रित बिजनेस मॉडल को यूजर प्राइवेसी को प्राथमिकता देने वाली दुनिया के साथ कैसे संतुलित कर पाती है। DPDP Act जैसे कानून यह स्पष्ट संकेत दे रहे हैं कि अब डेटा प्राइवेसी का सीधा एनफोर्समेंट होगा। Meta को अपने विज्ञापन-आधारित रेवेन्यू मॉडल और यूजर डेटा पर बढ़ते नियंत्रण की मांग के बीच एक नाजुक संतुलन बनाना होगा, जो आने वाले समय में उसके लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।