मद्रास हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि POCSO मामलों में 'सहमति से बने रोमांटिक रिश्ते' को बचाव के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि कानून 18 साल से कम उम्र के नाबालिगों की सहमति को मान्यता नहीं देता।
क्या हुआ?
मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने बाल यौन अपराध संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012 के संबंध में एक सख्त स्पष्टीकरण जारी किया है। जस्टिस एन आनंद वेंकटेश और जस्टिस केके रामकृष्णन की बेंच ने फैसला सुनाया कि यह अधिनियम उन व्यक्तियों के लिए कोई नरमी नहीं बरतता जो नाबालिग के साथ अपने रिश्ते को "सहमति से" या "रोमांटिक" बताते हैं। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि कानून के तहत, 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति सहमति देने में कानूनी रूप से अक्षम होते हैं, जिससे ऐसे बचाव कानूनी कार्यवाही में अमान्य हो जाते हैं।
कोर्ट का सहमति पर रुख
यह फैसला POCSO एक्ट के तहत एक 19 वर्षीय आरोपी के खिलाफ सुनवाई के दौरान आया, जिसने 11वीं कक्षा की छात्रा के साथ कथित तौर पर अपराध किया था। बचाव पक्ष ने तर्क दिया था कि रिश्ता आपसी सहमति से था और यह एक्ट ऐसे किशोर संबंधों पर लागू नहीं होना चाहिए जिसे दोनों पक्ष समझते हों। कोर्ट ने इस दलील को दृढ़ता से खारिज कर दिया। बेंच ने कहा कि भले ही ये तर्क सुनने में आकर्षक लगें, POCSO एक्ट ऐसे रोमांटिक रिश्तों के लिए कोई अपवाद नहीं देता। न्यायाधीशों ने दोहराया कि इस कानून का मुख्य उद्देश्य बच्चों के अधिकारों और हितों की रक्षा करना है, और किसी नाबालिग की सहमति को कानून द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि और सजा में बदलाव
इस मामले में श्रीविल्लुपुथुर के अतिरिक्त महिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा दोषी ठहराया गया था। अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया था कि आरोपी, जो नाबालिग को कक्षा 8 से जानता था, ने उससे शादी का वादा किया और 11वीं कक्षा के दौरान बार-बार यौन संबंध बनाए, जिससे गर्भधारण हुआ। ट्रायल कोर्ट ने POCSO एक्ट के तहत आरोपी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, साथ ही SC/ST एक्ट और आत्महत्या के लिए उकसाने के तहत भी दोषी ठहराया था।
अपने नवीनतम फैसले में, हाई कोर्ट ने सजा में संशोधन किया। POCSO एक्ट के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए, बेंच ने SC/ST एक्ट के तहत आरोपों से आरोपी को बरी कर दिया, क्योंकि जाति के आधार पर रिश्ते का कोई सबूत नहीं मिला। आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप भी खारिज कर दिया गया, क्योंकि आरोपी के कथित बयानों ने पर्याप्त उकसावा नहीं किया था। महत्वपूर्ण बात यह है कि कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा को घटाकर 10 साल की कठोर कारावास कर दिया। यह कमी संविधान के अनुच्छेद 20(1) की व्याख्या पर आधारित थी, जो POCSO एक्ट में 2019 के संशोधन द्वारा पेश किए गए सख्त दंडों के पूर्वव्यापी अनुप्रयोग को रोकता है।
फैसले का महत्व
यह फैसला एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल के तौर पर काम करेगा। यह POCSO एक्ट की व्याख्या के संबंध में एक स्पष्ट रेखा खींचता है, जिससे "सहमति से बने रोमांस" को कानूनी बचाव के रूप में उपयोग करने से रोका जा सके। स्पष्ट रूप से यह कहते हुए कि एक नाबालिग द्वारा वैध रूप से सहमति नहीं दी जा सकती, अदालत ने एक्ट की कठोर और सुरक्षात्मक प्रकृति को मजबूत किया है, जिसे रिश्ते की प्रकृति पर बाल सुरक्षा को प्राथमिकता देने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
निवेशक और समाज क्या निगरानी कर सकते हैं?
POCSO एक्ट से जुड़ा कानूनी परिदृश्य लगातार महत्वपूर्ण फोकस का क्षेत्र बना हुआ है। भारत की अदालतें अक्सर कठोर विधायी आदेशों और किशोर संबंधों की जटिलताओं के बीच संतुलन बनाती हैं। पर्यवेक्षकों के लिए, मुख्य निगरानी योग्य बिंदु ऐसे मामलों में इन कानूनी सिद्धांतों का लगातार अनुप्रयोग बना रहेगा, खासकर सजा और संशोधनों की व्याख्या के संबंध में। हाई कोर्ट से निरंतर स्पष्टता न्यायिक मंचों पर कानून की एक समान समझ बनाए रखने में मदद करती है।
