मद्रास हाई कोर्ट ने धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान थामिराबरानी नदी में कचरा फेंकने के खिलाफ चेतावनी दी है। हर दिन लगभग एक टन कपड़े फेंके जाने की रिपोर्टों का हवाला देते हुए, बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि धार्मिक स्वतंत्रता पर्यावरणीय कानूनों से ऊपर नहीं है। अदालत पारिस्थितिक क्षति और सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिमों को संबोधित करने के लिए 16 जुलाई तक हितधारकों से प्रस्तावों का इंतजार कर रही है।
धार्मिक आज़ादी या पर्यावरण की बर्बादी?
मद्रास हाई कोर्ट ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि धार्मिक आज़ादी के नाम पर पर्यावरण और जन स्वास्थ्य से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। कोर्ट ने तिरुनेलवेली जिले में थामिराबरानी नदी में धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान कपड़ों, प्लास्टिक और अन्य कचरों को बहाने पर चिंता जताई है।
नदी में हर दिन 1 टन कचरा
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट को चौंकाने वाले आंकड़े मिले। पता चला कि हर रोज़ लगभग 1 टन कपड़े नदी में फेंके जा रहे हैं। सिर्फ 7 मई से 28 मई के बीच हुई सफाई में 86 से 90 टन कपड़े नदी से निकाले गए। कपड़ों के अलावा, कांच की बोतलें, प्लास्टिक और सैनिटरी आइटम भी नदी के इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
संविधान क्या कहता है?
जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और बी पुगलेंदी की बेंच ने साफ किया कि संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक आज़ादी की बात करता है, लेकिन यह आज़ादी असीमित नहीं है। कोर्ट ने अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा कि हर नागरिक को स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार है। यह नियम तमिलनाडु पब्लिक हेल्थ एक्ट और वॉटर (प्रिवेंशन एंड कंट्रोल ऑफ पॉल्यूशन) एक्ट के तहत भी लागू होता है।
आगे क्या?
कोर्ट ने तुरंत रोक लगाने के बजाय सभी पक्षों को सुनकर एक स्थायी समाधान निकालने का फैसला किया है। तिरुनेलवेली के डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर को जागरूकता अभियान चलाने और हितधारकों से प्रस्ताव लेने का ज़िम्मा सौंपा गया है। कोर्ट इस मामले में अगली सुनवाई 16 जुलाई को करेगा, जिसके बाद नदी को बचाने के लिए आगे की रणनीति तय की जाएगी।
