मद्रास HC: पत्नी की पुलिस शिकायत का मतलब खुद-ब-खुद क्रूरता नहीं, कोर्ट ने साफ किया

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AuthorAditya Rao|Published at:
मद्रास HC: पत्नी की पुलिस शिकायत का मतलब खुद-ब-खुद क्रूरता नहीं, कोर्ट ने साफ किया

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मद्रास हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि पत्नी द्वारा पति के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराना अपने आप में मानसिक क्रूरता (mental cruelty) नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ऐसी कार्रवाई को तभी क्रूरता कहा जा सकता है जब शिकायत झूठी साबित हो, और इसके लिए सबूतों की जरूरत होगी।

कोर्ट का अहम फैसला

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने तलाक (divorce) के मामलों में मानसिक क्रूरता को लेकर बड़ी स्पष्टता दी है। कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई पत्नी अपने पति या उसके परिवार के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराती है, तो यह अपने आप में क्रूरता नहीं है। जस्टिस पी. वदमलाई ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि ऐसी शिकायत को केवल तभी क्रूरता माना जाएगा जब वह झूठी साबित हो।

यह मामला एक पति की तलाक की अर्जी से जुड़ा था, जिसने आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी ने उसके साथ क्रूरता की है और उसे छोड़ दिया है। पति का दावा था कि पत्नी ने झूठी पुलिस शिकायतें दर्ज कराईं, जिससे उसे मानसिक पीड़ा हुई। हालांकि, कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए पति की अपील खारिज कर दी।

सबूतों की अहमियत

इस फैसले में सबूतों का बोझ (burden of proof) एक अहम पहलू था। कोर्ट ने पाया कि पति अपनी क्रूरता या पत्नी के झगड़ालू स्वभाव के दावों को साबित करने के लिए कोई स्वतंत्र गवाह, जैसे पड़ोसी, पेश नहीं कर सका। वहीं, पत्नी ने मेडिकल रिकॉर्ड और पुलिस शिकायतों की रसीदों जैसे दस्तावेजी सबूत पेश किए। उसने सूचना का अधिकार (RTI) एक्ट के तहत जानकारी भी जमा की। पति इन दस्तावेजों का खंडन नहीं कर सका, जिससे झूठी शिकायतों के उसके तर्क कमजोर पड़ गए।

कानूनी मिसालों में अंतर

पति ने अपने मामले का समर्थन करने के लिए 2021 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देने की कोशिश की थी, जिसमें कहा गया था कि पति के पेशेवर करियर को प्रभावित करने वाली अपमानजनक शिकायतें मानसिक क्रूरता मानी जा सकती हैं। जस्टिस वदमलाई ने इस मामले को उस मिसाल से अलग बताया, क्योंकि इस बार ऐसा कोई सबूत नहीं था कि पत्नी ने पति के वरिष्ठों को शिकायतें भेजकर उसके पेशेवर रुतबे को नुकसान पहुंचाया हो।

कोर्ट ने यह भी देखा कि पत्नी ने वैवाहिक जीवन फिर से शुरू करने की इच्छा जताई थी, जबकि पति ने वैवाहिक अधिकार बहाल करने के लिए कोई प्रयास नहीं किया। यह फैसला याद दिलाता है कि अदालतें हर मामले के विशिष्ट परिस्थितियों, जैसे कि इरादे और ठोस सबूतों की उपलब्धता, को ध्यान में रखती हैं, न कि पति-पत्नी के बीच दर्ज की गई कानूनी शिकायतों पर कोई एक सामान्य नियम लागू करती हैं।

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Disclaimer:This article is published for informational purposes only. While reasonable efforts are made to ensure accuracy, completeness, and timeliness, readers are encouraged to independently verify information before making any decisions based on the content. The views and information presented are subject to editorial review and may be updated without notice.