MP High Court का बड़ा फैसला: ससुराल छोड़ने वाली पत्नी को नहीं मिलेगा भरण-पोषण, जानिए वजह

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AuthorNeha Patil|Published at:
MP High Court का बड़ा फैसला: ससुराल छोड़ने वाली पत्नी को नहीं मिलेगा भरण-पोषण, जानिए वजह

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि अगर कोई पत्नी सिर्फ इसलिए अपना ससुराल छोड़ देती है क्योंकि पति अपने माता-पिता की देखभाल कर रहा है, तो उसे भरण-पोषण (Maintenance) का हक नहीं है। कोर्ट का कहना है कि माता-पिता की देखभाल एक पारिवारिकThe Madhya Pradesh High Court has ruled that a wife is not entitled to maintenance if she leaves her matrimonial home solely because her husband cares for his parents. The court stated that such familial duties do not constitute a valid reason for separation. This decision overturns a previous family court order, though maintenance for the children remains unchanged.

हाई कोर्ट का अहम फैसला

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने भरण-पोषण (Maintenance) के दावों से जुड़े मामलों में एक बड़ा फैसला सुनाया है। जस्टिस जय कुमार पिल्लई ने साफ किया कि अगर कोई पत्नी सिर्फ इसलिए अपना घर छोड़ देती है क्योंकि पति अपने माता-पिता की देखभाल कर रहा है, तो यह आधार सही नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने कहा कि भारत में माता-पिता का ख्याल रखना एक सामाजिकThe Madhya Pradesh High Court, Indore Bench, has delivered a significant ruling concerning the grounds for claiming maintenance in matrimonial disputes. Justice Jai Kumar Pillai stated that a wife’s decision to abandon her matrimonial home cannot be justified simply because her husband prioritizes the care of his parents. The court highlighted that supporting one's parents is a recognized cultural norm in India and does not amount to a legal grievance that warrants a wife’s departure.

भरण-पोषण का पिछला आदेश पलटा

यह फैसला एक फैमिली कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर अपील पर आया है, जिसमें पति को अपनी पत्नी और दो बच्चों के लिए हर महीने ₹20,000 का भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था। निचली अदालत का मानना था कि पत्नी और सास-ससुर के बीच तनाव और पति का माता-पिता पर ज्यादा ध्यान देना, पत्नी के अलग रहने के लिए पर्याप्त कारण थे।

लेकिन हाई कोर्ट ने इस दलील को नहीं माना। कोर्ट ने साफ कहा कि पति की पारिवारिक जिम्मेदारियां, पत्नी के घर छोड़कर जाने और भरण-पोषण मांगने का कोई कानूनी आधार नहीं बनतीं।

पिछली कानूनी लड़ाइयों का असर

हाई कोर्ट के इस फैसले में दोनों पक्षों के बीच पहले हुई कानूनी लड़ाइयों का भी ध्यान रखा गया। पति ने यह साबित किया कि पत्नी ने पहले उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498-A के तहत क्रूरता का केस दर्ज कराया था, जिसमें पति और उसके परिवार को बरी कर दिया गया था।

कोर्ट ने कहा कि जब क्रूरता के आरोप साबित नहीं हुए, तो वे पत्नी के वर्तमान अलगाव का आधार नहीं बन सकते। इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी पाया कि पत्नी ने पहले के मामलों में पति पर अवैध संबंध के भी आरोप लगाए थे, जिन्हें बेंच ने मानसिक क्रूरता माना।

बच्चों के लिए भरण-पोषण जारी

हालांकि, हाई कोर्ट ने पत्नी के लिए भरण-पोषण का आदेश रद्द कर दिया, लेकिन बच्चों के लिए दी जाने वाली वित्तीय मदद में कोई बदलाव नहीं किया। कोर्ट ने पिता के अपनी संतानों का भरण-पोषण करने के दायित्व को बरकरार रखा है, ताकि वैवाहिक विवाद का असर बच्चों के भविष्य पर न पड़े। यह फैसला भविष्य में ऐसे पारिवारिक मामलों में अदालतों के लिए एक मिसाल साबित हो सकता है।

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