MP हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: GST अधिकारी को ब्लैकमेल करने वाले पत्रकार की जमानत याचिका खारिज

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
MP हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: GST अधिकारी को ब्लैकमेल करने वाले पत्रकार की जमानत याचिका खारिज

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक पत्रकार को ज़बरदस्त झटका दिया है। कोर्ट ने गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) अधिकारी से वसूली के आरोप में फंसे पत्रकार प्रदीप कुमार जाटव की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है।

कोर्ट में क्या हुआ?

ग्वालियर बेंच के जस्टिस राजेश कुमार गुप्ता ने यह फैसला सुनाया। उन्होंने सबूतों, जिनमें WhatsApp चैट और सोशल मीडिया की रिकॉर्डिंग शामिल हैं, की जांच के बाद पत्रकार को राहत देने से इनकार कर दिया।

मामला शुरू कैसे हुआ?

पूरा मामला जुलाई 2025 में शुरू हुआ, जब पत्रकार की GST रजिस्ट्रेशन की अर्ज़ी को रिजेक्ट कर दिया गया था। कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक, यह रिजेक्शन ज़रूरी डॉक्यूमेंट्स, जैसे पहचान पत्र, जमा न करने की वजह से हुआ था। इसके बाद, पत्रकार ने कथित तौर पर अधिकारी पर फैसला बदलने का दबाव बनाने के लिए बार-बार ऑफिस का चक्कर लगाया। जब उनकी मांग पूरी नहीं हुई, तो उन्होंने ₹20 लाख के पर्सनल लॉस का दावा करते हुए अधिकारी से हर्जाना मांगा।

धमकी और ब्लैकमेलिंग के आरोप

दिसंबर 2025 से, स्थिति बिगड़ गई और अधिकारी को परेशान करने का सिलसिला शुरू हो गया। अभियोजन पक्ष ने कोर्ट को बताया कि आरोपी ने डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करके अधिकारी को निशाना बनाया। इसमें सोशल मीडिया पर अपमानजनक बातें फैलाना और अधिकारी के घर के पते और परिवार के सदस्यों की निजी जानकारी सार्वजनिक करना शामिल था।

कोर्ट में पेश किए गए सबूत बताते हैं कि यह सब अधिकारी पर दबाव बनाने के लिए किया गया था। आरोपी ने कथित तौर पर ऑनलाइन बदनामी रोकने के लिए ₹1 करोड़ की मांग की और अधिकारी व उनके परिवार के खिलाफ झूठे क्रिमिनल केस दर्ज कराने की धमकी दी। अधिकारी द्वारा कॉल ब्लॉक करने के बाद भी, धमकी कई माध्यमों से जारी रही।

ज्यूडिशरी का स्टैंड

आरोपी के वकील ने दलील दी कि पत्रकार व्हिसलब्लोअर (Whistleblower) के तौर पर काम कर रहा था और अधिकारी के कथित कदाचार का पर्दाफाश करने की कोशिश कर रहा था। उन्होंने यह भी कहा कि हिरासत में पूछताछ की ज़रूरत नहीं है।

हालांकि, हाई कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज कर दिया और केस डायरी में मिले सबूतों पर ज़ोर दिया। कोर्ट ने कहा कि डिजिटल कम्युनिकेशन और वसूली की धमकियों जैसे सबूत, भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत जमानत देने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। यह फैसला पब्लिक सर्वेंट्स (Public Servants) को डराने-धमकाने से बचाने के ज्यूडिशियल स्टैंड को मज़बूत करता है, खासकर जब यह प्रशासनिक या रेगुलेटरी फैसलों को प्रभावित करने की कोशिश हो।

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