ज्यूडिशियल हार्मोनाइजेशन (Judicial Harmonization) -
केरल हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए राज्य के सभी फैमिली कोर्ट्स के लिए कलकत्ता हाई कोर्ट के चाइल्ड कस्टडी और पेरेंटिंग प्लान (Parenting Plan) से जुड़े दिशानिर्देशों को अपनाने का आदेश दिया है। इससे पहले, केरल के फैमिली कोर्ट्स में बच्चों की कस्टडी और मुलाकात (visitation) को लेकर कोई एकसमान नियम नहीं थे, जिससे फैसलों में एकरूपता की कमी देखी जाती थी। कोर्ट का यह कदम बच्चों के सर्वोत्तम हित को सुनिश्चित करने और माता-पिता के बीच चल रहे कानूनी झगड़ों में उन्हें नुकसान से बचाने के लिए उठाया गया है।
'कलकत्ता मॉडल' के मुख्य बिंदु -
यह नया ढांचा, जिसे कलकत्ता हाई कोर्ट ने 2025 के अंत में मंजूरी दी थी, एक व्यवस्थित पेरेंटिंग प्लान पर जोर देता है। इसका मकसद बच्चों को कानूनी विवादों में संपत्ति की तरह इस्तेमाल होने से रोकना है। कोर्ट यह सुनिश्चित करेगा कि अलगाव का बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभाव को ध्यान में रखा जाए, न कि सिर्फ हार-जीत के नजरिए से मामले को देखा जाए। यह निर्देश विधायिका द्वारा राज्य-विशिष्ट नियम बनाने में होने वाली देरी को दरकिनार करते हुए, तुरंत प्रभाव से लागू होगा।
कानूनी मिसाल और चुनौतियाँ -
यह फैसला एक Habeas Corpus याचिका के जवाब में आया है, जिसमें मौजूदा कस्टडी आदेशों का पालन न होने की प्रणालीगत कमजोरी को उजागर किया गया था। इस विशेष मामले में, पिता ने स्कूल से बच्चे को ले जाकर कोर्ट के आदेश का उल्लंघन किया था, जिसने मौजूदा अनुपालन तंत्र की सीमाओं को दिखाया। कोर्ट ने पिता की दलीलों को खारिज करते हुए, कानूनी संशोधनों की आवश्यकता पर जोर दिया है, और उन लोगों के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' (Zero Tolerance) रवैया अपनाने का संकेत दिया है जो न्यायिक प्रक्रिया को दरकिनार कर स्वयं कार्रवाई करते हैं।
जोखिम और कमजोरियां -
हालांकि इन दिशानिर्देशों को अपनाने से एकरूपता आएगी, लेकिन इनके प्रभावी कार्यान्वयन में कई बाधाएं आ सकती हैं। आलोचकों का कहना है कि केरल के सामाजिक-आर्थिक हालात पश्चिम बंगाल से अलग हो सकते हैं, जिससे इन्हें लागू करने में मुश्किलें आ सकती हैं। इसके अलावा, कोर्ट द्वारा अनिवार्य पेरेंटिंग प्लान्स के लिए सोशल सर्विस डिपार्टमेंट्स (Social Service Departments) से महत्वपूर्ण निगरानी की आवश्यकता होगी, जो अक्सर संसाधनों की कमी से जूझते हैं। यह एक बड़ा जोखिम है कि कोर्ट द्वारा नियुक्त काउंसलर (Counselors) और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए पर्याप्त धन के बिना, ये विस्तृत दिशानिर्देश केवल कागजों तक ही सीमित रह सकते हैं। कोर्ट की असली परीक्षा यह होगी कि वे ऐसे पक्षों के खिलाफ इन मानकों को कैसे लागू करते हैं जो कस्टडी शेड्यूल का पालन नहीं करते। खासकर, पैरेंटल एलियनेशन (Parental Alienation) और अपहरण जैसी युक्तियों के खिलाफ त्वरित दंडात्मक कार्रवाई की कमी एक बड़ी बाधा बनी रहेगी।
