केरल हाईकोर्ट में वक्फ बोर्ड की संरचना पर नई जनहित याचिका, पूर्व MLA की योग्यता पर सवाल

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AuthorMehul Desai|Published at:
केरल हाईकोर्ट में वक्फ बोर्ड की संरचना पर नई जनहित याचिका, पूर्व MLA की योग्यता पर सवाल

केरल हाईकोर्ट में राज्य वक्फ बोर्ड की संरचना को लेकर एक नई जनहित याचिका दायर की गई है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि 2026 के विधानसभा चुनावों के बाद एक बोर्ड सदस्य अब वक्फ अधिनियम के तहत आवश्यक विधायी मानदंडों को पूरा नहीं करते हैं, जिससे बोर्ड के हालिया फैसलों की वैधता पर सवाल खड़ा हो गया है।

क्या हुआ?

केरल हाईकोर्ट में राज्य वक्फ बोर्ड के गठन को लेकर एक नई कानूनी चुनौती सामने आई है। रिटायर्ड भारतीय सेना जूनियर वारंट ऑफिसर स्टालिन वीएम द्वारा दायर इस याचिका में पूर्व विधायक कुनहमद कुट्टी मास्टर की बोर्ड में सदस्यता पर विशेष रूप से आपत्ति जताई गई है। याचिका में कहा गया है कि कुट्टी मास्टर का बोर्ड में बने रहना संशोधित वक्फ अधिनियम का उल्लंघन है, क्योंकि 2026 के राज्य विधानसभा चुनावों के बाद वे अब विधायक नहीं हैं। याचिकाकर्ता चाहता है कि कोर्ट बोर्ड के पुनर्गठन का आदेश दे, क्योंकि वर्तमान संरचना अनिवार्य वैधानिक आवश्यकताओं का पालन नहीं करती है।

कानूनी अनुपालन के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है?

मुख्य मुद्दा यह है कि क्या एक बोर्ड सदस्य, जिसे मूल रूप से एक विशेष विधायी कोटे के तहत नियुक्त किया गया था, अपनी उस योग्यता को खोने के बाद भी अपने पद पर बना रह सकता है जिसने उसे पात्र बनाया था। याचिका के अनुसार, कुट्टी मास्टर को वक्फ अधिनियम की धारा 14(1)(बी)(ii) के तहत विधानसभा सदस्य के लिए आरक्षित सीट पर नियुक्त किया गया था। याचिकाकर्ता का तर्क है कि उनका कार्यकाल विधायक के रूप में उनके कार्यकाल के साथ ही प्रभावी रूप से समाप्त हो जाना चाहिए था, और उनकी निरंतर भागीदारी बोर्ड की कानूनी स्थिति को कमजोर करती है।

कानूनी जांच का बढ़ता दायरा

यह मामला केरल राज्य वक्फ बोर्ड के अधिकार क्षेत्र और गठन को लेकर चल रही कानूनी चुनौतियों की श्रृंखला में एक और कड़ी जोड़ता है। बोर्ड, जिसका पुनर्गठन 4 फरवरी, 2026 को एक सरकारी अधिसूचना के माध्यम से किया गया था, पहले से ही बीजेपी के प्रदेश उपाध्यक्ष शोन जॉर्ज और एक ईसाई ट्रस्ट द्वारा दायर अलग-अलग याचिकाओं के कारण हाईकोर्ट में जांच के दायरे में है। इन पिछली याचिकाओं में वक्फ अधिनियम में 2025 के संशोधनों द्वारा आवश्यक अनिवार्य गैर-मुस्लिम सदस्यों की कथित अनुपस्थिति और विविध सामुदायिक प्रतिनिधित्व की कमी के बारे में चिंता जताई गई थी। इन जनादेशों को शामिल करने का उद्देश्य बोर्ड के लिए एक अधिक संतुलित और पारदर्शी प्रशासनिक संरचना सुनिश्चित करना था।

बोर्ड के फैसलों पर संभावित प्रभाव

याचिकाकर्ता ने प्रशासनिक कार्यों की वैधता के संबंध में एक महत्वपूर्ण बिंदु उठाया है। याचिका में तर्क दिया गया है कि यदि बोर्ड का गठन अनिवार्य वैधानिक मानदंडों के अनुसार नहीं किया गया था, तो उसके निर्णय लेने का अधिकार क्षेत्र प्रभावित होता है। यदि अदालत को पता चलता है कि बोर्ड की वर्तमान संरचना कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण है, तो इससे 2026 की शुरुआत में इसके गठन के बाद से बोर्ड द्वारा लिए गए निर्णयों, भूमि दावों या प्रशासनिक कार्यवाहियों की वैधता पर सवाल उठ सकते हैं।

आगे क्या देखना है?

केरल में भूमि और प्रशासनिक मामलों में रुचि रखने वाले निवेशकों और हितधारकों को इस याचिका और संबंधित मामलों के संबंध में आगामी हाईकोर्ट की सुनवाई पर नजर रखनी चाहिए। मुख्य निगरानी योग्य बातों में यह शामिल है कि क्या अदालत बोर्ड की कार्यवाही पर कोई अंतरिम रोक लगाती है, बोर्ड की संरचना के संबंध में सरकार की क्या प्रतिक्रिया आती है, और अंततः क्या बोर्ड को 2025 के संशोधन मानकों को पूरा करने के लिए पुनर्गठित करने की आवश्यकता होगी, इस पर अदालती निर्देश क्या होते हैं।

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