सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर मोनालिसा भोसले के पति मोहम्मद फरमान खान को केरल हाई कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने उनकी ट्रांजिट अग्रिम जमानत (Transit Anticipatory Bail) की अवधि बढ़ाने से साफ इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि FIR मध्य प्रदेश में दर्ज है, इसलिए केरल हाई कोर्ट का इस मामले में कोई क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) नहीं है।
क्या हुआ?
केरल हाई कोर्ट ने शुक्रवार को मोहम्मद फरमान खान की ट्रांजिट अग्रिम जमानत बढ़ाने की याचिका खारिज कर दी। खान, जो सोशल मीडिया पर मोनालिसा भोसले के पति के तौर पर जाने जाते हैं, उन्हें कोर्ट ने एक महीने की अस्थायी सुरक्षा दी थी ताकि वे मध्य प्रदेश के संबंधित कानूनी अधिकारियों से संपर्क कर सकें। यह अवधि समाप्त होने पर, खान के वकीलों ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में अपील दायर करने के लिए और समय की मांग करते हुए जमानत बढ़ाने की अर्जी दी थी।
जस्टिस कौसर एडप्पगथ ने इस अनुरोध को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि केरल हाई कोर्ट के पास इस तरह की राहत जारी रखने का क्षेत्राधिकार नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि उसने प्रारंभिक अस्थायी ट्रांजिट जमानत देकर अपनी अधिकतम शक्तियों का प्रयोग कर लिया था।
कोर्ट ने क्यों क्षेत्राधिकार का दिया हवाला?
यह फैसला सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया द्वारा स्थापित प्रक्रियात्मक सीमाओं पर केंद्रित था। जस्टिस एडप्पगथ ने प्रिया इंडोरिया बनाम स्टेट ऑफ कर्नाटक मामले के फैसले का हवाला दिया। इस फैसले के अनुसार, अग्रिम जमानत के लिए आवेदन आम तौर पर उसी अदालत में दायर किया जाना चाहिए जहां फर्स्ट इंफॉर्मेशन रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस नियम के अपवाद दुर्लभ हैं और इसके लिए ऐसे पुख्ता सबूतों की आवश्यकता होती है जो FIR दर्ज होने वाले क्षेत्राधिकार के बाहर की अदालत में जाने की अनिवार्यता को दर्शाते हों। चूंकि इन मानदंडों को कोर्ट की संतुष्टि के अनुसार पूरा नहीं किया गया, इसलिए जमानत बढ़ाने की अर्जी खारिज कर दी गई।
मामले की पृष्ठभूमि
यह कानूनी कार्यवाही मध्य प्रदेश में दर्ज एक आपराधिक मामले से जुड़ी है। मोहम्मद फरमान खान ने मोनालिसा भोसले से 11 मार्च 2026 को केरल में शादी की थी। मोनालिसा भोसले 2025 कुंभ मेले के दौरान 'लहंगा बेचते हुए' वीडियो के कारण सोशल मीडिया पर चर्चा में आई थीं।
शादी के बाद, इस रिश्ते की वैधता और घटना के समय मोनालिसा भोसले की उम्र को लेकर आरोप लगे। मोनालिसा के पिता ने बाद में अपहरण का आरोप लगाते हुए एक औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। इन आरोपों के कारण, बच्चों के यौन अपराधों से संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत संभावित अपराधों सहित आपराधिक आरोप लगाए गए हैं। यह मामला उस क्षेत्राधिकार में चल रही कानूनी जांच का विषय बना हुआ है जहां मामला शुरू में दायर किया गया था।
आगे की कानूनी प्रक्रिया
केरल में याचिका खारिज होने के बाद, आरोपी के लिए कानूनी विकल्प अब उस क्षेत्राधिकार में वापस चले गए हैं जहां FIR दर्ज की गई थी। यह मामला आपराधिक कानून में क्षेत्राधिकार के मानदंडों के महत्व को रेखांकित करता है, खासकर यह कि हाई कोर्ट ट्रांजिट जमानत को कैसे संभालते हैं। ऐसे मामलों में शामिल पक्षों को अब आगे की राहत पाने के लिए उस राज्य की कानूनी प्रणाली से निपटना होगा जहां से मामला उत्पन्न हुआ था।
