कोर्ट की नजर में अवैध रेत खनन का खेल
कर्नाटक हाई कोर्ट ने राज्य में चल रहे बेरोकटोक अवैध रेत खनन पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। मीडिया रिपोर्ट्स और खुद राज्य के गृह मंत्री के इस बात को स्वीकार करने के बाद कि सरकार इस पर काबू पाने में नाकाम है, कोर्ट ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए एक जनहित याचिका (PIL) दायर की है। जस्टिस डी के सिंह और जस्टिस तारा विटास्ता गंजू की डिवीजन बेंच ने कहा कि राज्य मशीनरी की इस गतिविधि को रोकने में विफलता, जिसे गृह मंत्री ने भी माना है, यह गहरे बैठे समस्या और शक्तिशाली सिंडिकेट्स की ओर इशारा करती है। कोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि प्रभावशाली लोग बिना किसी डर के काम कर रहे हैं।
पर्यावरण और समाज पर भारी असर
कोर्ट के इस हस्तक्षेप ने अवैध रेत निकासी के गंभीर पर्यावरणीय परिणामों को उजागर किया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, कृष्णा नदी बेसिन में रातों-रात रेत निकाली जा रही है, जिससे नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को भारी नुकसान हो रहा है। किसानों ने फसलों को प्रभावित करने वाले धूल प्रदूषण पर भी चिंता जताई है। पर्यावरणीय क्षति के अलावा, कोर्ट ने सार्वजनिक सुरक्षा के जोखिमों का भी उल्लेख किया, जिसमें अवैध खनन से जुड़े वाहनों से होने वाली मौतें शामिल हैं। सीसीटीवी कैमरों और चेक पोस्ट जैसी बुनियादी निगरानी सुविधाओं की कमी इन मुद्दों को और बढ़ाती है, जिससे प्रवर्तन मुश्किल हो जाता है। एक महिला विधायक को उनके निर्वाचन क्षेत्र में अवैध खनन का विरोध करने के लिए जान से मारने की धमकी मिलने का एक परेशान करने वाला मामला भी सामने आया, जो इस व्यापार के आसपास के खतरनाक माहौल को दर्शाता है।
प्रभावशाली लोगों का 'हित' और कानूनी अड़चनें
अवैध रेत खनन के संचालन की जांच से पता चलता है कि इस प्रक्रिया को कानूनी बनाने में भारी प्रतिरोध है। कोर्ट ने देखा कि कानूनी रेत निकासी के लिए बोलियां आमंत्रित की गई हैं, लेकिन वे अभी भी नहीं खोली गई हैं। यह इंगित करता है कि इस लाभदायक रैकेट में शामिल 'बड़े मगरमच्छ' उद्योग के औपचारिकरण को सक्रिय रूप से रोक रहे हैं। वैधीकरण से राज्य को राजस्व मिलेगा और इन शक्तिशाली समूहों की अवैध कमाई पर सीधा असर पड़ेगा। रिपोर्ट्स बताती हैं कि कुछ सरकारी अधिकारी भी इसमें शामिल हो सकते हैं, जिससे राज्य के खजाने को हर साल अनुमानित ₹400 करोड़ का नुकसान हो रहा है। कर्नाटक सैंड पॉलिसी 2021 का उद्देश्य मांग-आपूर्ति के अंतर को पाटना और अवैध परिवहन को खत्म करना था, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थापित अवैध ऑपरेशनों के खिलाफ इसकी प्रभावशीलता एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
अदालती कार्रवाई और आगे की राह
हाई कोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान लेना एक महत्वपूर्ण मोड़ का संकेत देता है। बेंच ने राज्य के गृह विभाग, खान और भूविज्ञान विभाग, और वन एवं पर्यावरण विभागों को तीन सप्ताह के भीतर अपनी विस्तृत प्रतिक्रिया प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। मामले को आगे की सुनवाई के लिए एक उपयुक्त बेंच को सौंपने के लिए मुख्य न्यायाधीश को भेज दिया गया है, और अदालत एक केंद्रीय एजेंसी या स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) द्वारा कोर्ट की निगरानी में जांच पर भी विचार कर रही है। यह कदम खनन नियमों और पर्यावरण संरक्षण से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के पिछले कार्यों की तरह, पर्यावरण और संसाधन-संबंधी मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की व्यापक प्रवृत्ति को दर्शाता है। गृह मंत्री की लाचारी को कोर्ट द्वारा स्वीकार करना मामले की गंभीरता को दर्शाता है, यह इंगित करता है कि राज्य मशीनरी अकेले ही इस गहरी पैठी 'रेत माफिया' से निपटने के लिए अपर्याप्त हो सकती है।
पिछले विश्लेषणों ने अवैध रेत खनन के कारण हुए भारी आर्थिक नुकसान को दर्शाया है, जिसमें अनुमानित ₹200 करोड़ सालाना रॉयल्टी के रूप में राज्य को नुकसान होता है, जबकि वैध ऑपरेशनों से केवल ₹150 करोड़ का राजस्व आता है। इसके अलावा, पर्यावरणीय प्रभाव में भूजल की कमी शामिल है, एक अध्ययन में कोलर जिले में रेत खनन के कारण कुओं की गहराई में 64% की वृद्धि देखी गई, और महत्वपूर्ण कृषि भूमि अनुपयोगी हो गई। इस न्यायिक कार्रवाई से नियामक निकायों पर दबाव पड़ने और स्थापित अवैध नेटवर्कों में व्यवधान आने की उम्मीद है।